Friday, May 1, 2026

इतनी सी बात की शिकायत तुमसे ( गजल)

इतनी सी बात की शिकायत तुमसे  ( गजल)
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कुदरत का कैसा गजब फैसला हो गया/
मुझे बुखार चढ़ा तो तुम्हें नजला हो गया/

तुम्हारे बिना गजल मुकम्मल मेरी कैसे होती,
बिना मतले के ही पूरा ये कैसे मकता हो गया/

नाक तुम्हारी लाल तो चेहरा गुलाबी हो गया,
बैठे बिठाए तुमसे सारी रात का फासला हो गया/

ये किसने कहा, मुझे तुमसे मुहब्बत न रही,
देख तो बैठे-बैठे ही रात से सबेरा हो गया/

जाग चल मुसाफिर फिर से अपनी डगर,
देख सामने जरा मेरे, मंजिल का नजारा हो गया/

मौत घूमती है अब तो गिर्दाब में हमें समेटे हुए,
किसने बताया, कैसे उसको हमारा पता हो गया/

शाम से ही बिजलियों का रक्स देखने का अरमां था,
ये तो पहले से ही कुहरा और घना हो गया/

शिद्दते- गम सितारों की बारात उठने से पहले बढ़ा,
अब तो एक मजलूम भी घोड़े पर चढ़ दूल्हा बना/

कुछ गजब के किस्से, कायनात में थे बिखरे हुए,
समेटने में उन्हें, मुझे तो जमाना लगा/

' रतन' को इतनी सी बात की शिकायत तुमसे,
मुखातिब हुए तो, तुम्हारे मुँह में ताला लगा//

              राजीव रत्नेश
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