इतनी सी बात की शिकायत तुमसे ( गजल)
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कुदरत का कैसा गजब फैसला हो गया/
मुझे बुखार चढ़ा तो तुम्हें नजला हो गया/
तुम्हारे बिना गजल मुकम्मल मेरी कैसे होती,
बिना मतले के ही पूरा ये कैसे मकता हो गया/
नाक तुम्हारी लाल तो चेहरा गुलाबी हो गया,
बैठे बिठाए तुमसे सारी रात का फासला हो गया/
ये किसने कहा, मुझे तुमसे मुहब्बत न रही,
देख तो बैठे-बैठे ही रात से सबेरा हो गया/
जाग चल मुसाफिर फिर से अपनी डगर,
देख सामने जरा मेरे, मंजिल का नजारा हो गया/
मौत घूमती है अब तो गिर्दाब में हमें समेटे हुए,
किसने बताया, कैसे उसको हमारा पता हो गया/
शाम से ही बिजलियों का रक्स देखने का अरमां था,
ये तो पहले से ही कुहरा और घना हो गया/
शिद्दते- गम सितारों की बारात उठने से पहले बढ़ा,
अब तो एक मजलूम भी घोड़े पर चढ़ दूल्हा बना/
कुछ गजब के किस्से, कायनात में थे बिखरे हुए,
समेटने में उन्हें, मुझे तो जमाना लगा/
' रतन' को इतनी सी बात की शिकायत तुमसे,
मुखातिब हुए तो, तुम्हारे मुँह में ताला लगा//
राजीव रत्नेश
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