Sunday, May 3, 2026

हम भंवर से साहिल पे आए ( कविता )

हम भँवर से साहिल पे आए  ( कविता)
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तेरी जुल्फों के साये का ठिकाना नहीं ,
उधर का रास्ता भी छोड़ा साकी/
छाए हैं बादल, दिल के आस्मां में,
पर आँखों से होती बरसात नहीं/

जागा मुसाफिर हूँ सारी रात का,
तुझको इस बात का इमकान नहीं/
सितारा- सितारा गवाह है आस्मां का,
घुट गए दिल के अरमान सभी/

आँखों का काजल बहा गालों पर,
पर अलकों का श्रृंगार वही/
समझ- बूझ कर कभी छेड़ते नहीं,
लटें तेरी जैसे लतर- ए- हरसिंगार सही/

कभी जिसकी जद तक पहुँचा नहीं,
तेरी नाक है कुतुबमीनार- ए- दिल्ली/
हम क्या और करते, आफत में जां,
हो न सका कहीं तेरा दीदार सही/

जुनून ही था, तुझे प्यार कर बैठा हूँ,
भले करती तू प्यार का व्यापार सही/
महाजनों को बोलो, लौट कर मयखाने से,
कर दूँगा चुकता सबका उधार सही/

चारा लगाया था सनम ने काँटे में,
पर फंसा कोई शिकार नहीं/
हमीं उनकी पहुँच में आ गए,
कहते हैं वो,' हम खतावार नहीं'/

बोझल हो चलीं साँसें अब तो,
नकहतों का मैं अब तलबगार नहीं/
बेमोल बिकती जवानी जिन्स बिना,
किसी माल से मतलब नहीं, हम खरीदार नहीं/

जगमग होती कश्ती अब बीच भंवर,
नाखुदा हूँ पर पास पतवार नहीं/
मस्तूल के सहारे बढ़ चले हैं,
जिधर चले हवा, उधर ही सफर सही/

जज्ब- ए- दिल मचल उठा , तुझे देख कर,
साहिल से ही था तुम्हें इंतजार सही/
तुम्हारा ही आसरा था, शुरू से मुझको,
करोगी समझौता इस बार भी सही/

जन्म-जन्म का मैं तेरा दीवाना,
रूप देख शमां का शलभ सा क्षार हुआ भी/
तुझे अब क्या आजमाते, दिल तो पागल हुआ,
कश्ती आके जब जजीरे से लगी/

सबक दे गए हमेशा के लिए मुझे,
जिन्दगी में तेरे दिए सदमात सही/
भटकता फिरा सुकूं की तलाश में,
पास आकर तेरे, मिला जिन्दगी को पड़ाव सही/

हारा न हिम्मत, बिसारा न हरिनाम,
मिले बेतहाशा जिन्दगी को उल्झाव सही/
दगा जो तूने दिए थे, कदम-कदम पे मुझे,
उसी से मिले मंजिल के निशानात सही/

ठिठुरता तन-बदन रहा मेरा कोलड- स्टोरेज सा,
आ गया जाकर कहीं बदलते मौसम की चपेट में/
तेरे बदन की तपिश से ही कुछ राहत हुई,
डाला डेरा जब आकर तेरी सराय में ही/

तेरे पास आकर ही मिटी थकान सफर की/
उल्झनों भरी जिंदगी को' रतन' मिला ठहराव सही//

             राजीव रत्नेश
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