सुनूँ जो काश! फिरसे ( गजल)
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मेरे लबों पे फकत तेरा ही फसाना होगा/
यही पेश तेरे दिल को मेरा नजराना होगा/
ताइरे- मजरूह सा तड़पता हूँ मैं तेरे बगैर,
समझा न था दिल ही मेरा तेरा निशाना होगा/
शाहजादी महलों की, रानी तू सितारों की,
तुझको छोड़ मुझे भला किसका आसरा होगा/
रिन्द सब पी पी कर बेहोश हुए, मैं भी मदहोश रहा,
सबके साथ मुझे भी खाना करने का था इरादा तेरा/
साहिल तक तो तुम मेरे हमसफर रहे थे,
साथ छोड़ा तुमने, भँवर में जब मैं अकेला पड़ा/
अकेले ही बढ़ता रहा, मंजिल की डगर में मैं,
तू मिल गई सबसे, साथ तेरे सारा जमाना रहा/
दूर रहने की अदा- ओ- तरकीब तेरी मेहरबानी है,
तुमने न सोचा, गर्दिश में यार तुम्हारा पुराना होगा /
सितारों की तरह झिलमिलाना, पसंद न था मुझे तेरा,
शीतल चाँद प्यारा था, प्यारा था साथ गुजारा तेरा/
आजा फिर से मुकाबिले- महफिल, कर के इशारा,
जाम लेकर हाथों में आना, दे जाना नशा प्यारा अपना/
फिर से' रतन' के लबों से तरन्नुम फूट निकलेंगे,
सुनूँ जो काश! फिर से एक बार गुनगुनाना तेरा//
राजीव रत्नेश
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