Friday, May 1, 2026

सुनूँ जो काश! फिर से ( गजल)

सुनूँ जो काश! फिरसे  ( गजल)
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मेरे लबों पे फकत तेरा ही फसाना होगा/
यही पेश तेरे दिल को मेरा नजराना होगा/

ताइरे- मजरूह सा तड़पता हूँ मैं तेरे बगैर,
समझा न था दिल ही मेरा तेरा निशाना होगा/

शाहजादी महलों की, रानी तू सितारों की,
तुझको छोड़ मुझे भला किसका आसरा होगा/

रिन्द सब पी पी कर बेहोश हुए, मैं भी मदहोश रहा,
सबके साथ मुझे भी खाना करने का था इरादा तेरा/

साहिल तक तो तुम मेरे हमसफर रहे थे,
साथ छोड़ा तुमने, भँवर में जब मैं अकेला पड़ा/

अकेले ही बढ़ता रहा, मंजिल की डगर में मैं,
तू मिल गई सबसे, साथ तेरे सारा जमाना रहा/

दूर रहने की अदा- ओ- तरकीब तेरी मेहरबानी है,
तुमने न सोचा, गर्दिश में यार तुम्हारा पुराना होगा /

सितारों की तरह झिलमिलाना, पसंद न था मुझे तेरा,
शीतल चाँद प्यारा था, प्यारा था साथ गुजारा तेरा/

आजा फिर से मुकाबिले- महफिल, कर के इशारा,
जाम लेकर हाथों में आना, दे जाना नशा प्यारा अपना/

फिर से' रतन' के लबों से तरन्नुम फूट निकलेंगे,
सुनूँ जो काश! फिर से एक बार गुनगुनाना तेरा//

             राजीव रत्नेश
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