रतन नहीं निशाना लगाने वाला ( गजल )
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मैं कभी नहीं था, तुझे खोकर खसारा करने वाला/
फिर पाके तुझे नहीं खसारे पे खसारा करने वाला/
जख्म के दर्द ने, कुछ इस तरह झिंझोड़ा मुझको,
कि अब नहीं तुझसे, मुहब्बत का तगादा करने वाला/
वक्त के समंदर में अच्छे- अच्छे बह जाते हैं, खप जाते हैं,
जानता हूँ ये वक्त नहीं किसी का साथ निभाने वाला/
तेरा प्यार और तेरी मेहरबानियाँ, तुझे ही हों मुबारक,
मैं नहीं अब खुद से कोई तेरा इशारा समझने वाला /
नैन-नक्श तेरे कसीदा, उस पर गजल का अंदाज मेरा,
चेहरा तेरा उकेरा है रेत पर, नहीं पैरहन उकेरने वाला/
है फुसूं तेरी हर बात में, इस तिलिस्माते- दुनिया का,
मैं सुखन- ए- अदब से नहीं कोई तमाशा दिखाने वाला/
मैं इस जमाने का मीर नहीं कि लबों को तेरे पंखड़ी- ए-
गुलाब लिखूँ,
आतिशे- लब ने कितनी बार जलाया मुझे, मैं नहीं वो किस्सा सुनाने वाला/
तूने मेरे प्यार को मजाक का हासिल समझ रखा था,
तुझसे साहिल पे मिलने का, अब नहीं इरादा करने वाला/
मेरी बज्म में आए हो, कोई अन्जानी राह पकड़ कर,
दिले- खाकसार का अब, तुझे नहीं खिलौना देने वाला/
रात के ख्वाबों में ही मिलने को तुम तो चले आते हो,
मेरा अरमान, तेरी यादों के बिना ही, सबेरा करने वाला/
तू तो रात भर का मुसाफिर, सिर्फ मेरे जेहन में,
' रतन ' नहीं अँधेरों में कोई निशाना लगाने वाला/
राजीव रत्नेश
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ख्वाबों के मुसाफिर को, अब सुबह का सलाम है/
रतन के दिल में अब सिर्फ खुद्दारी का अहसास है//
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