तुझे हमेशा के लिए ही ( गजल )
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खेल-खेल में ही यह क्या खेला हो गया/
तू मेरी हो गई, थोड़ी देर को मैं तेरा हो गया/
अंगूठी तो पहनाई गई थी आखिर देखभाल के,
तेरी गुड्डी की मेरे गुड्डू से देख झमेला हो गया/
हर कोई जताने लगा तुझ पर दीवानगी अपनी,
मेरे लिए माहौल- ए- महफिल कसैला हो गया/
पिला या न पिला जाम अपने हाथों से मुझे,
फिर भी महफिल में आने का हौसला हो गया/
बरसने लगी थोड़ी गुलाबी भी तेरी आँखों से,
देखो अब मौसम भी आशिकाना हो गया/
हिफाजत तो दिल की सदा की, हर धड़कन के पहले,
लाद के ले जाए शेख जी, ये कैसा माजरा हो गया/
नजर को तो तीरगी का अहसास भी कुछ न था,
बादल गरज उठे तो छाला दिल का अलबेला हो गया/
रस्मो- राह तुझसे हमेशा से रही, तू अकेली कहाँ?
तुझे हमेशा के लिए ही ' रतन ' का सहारा हो गया//
राजीव रत्नेश

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