चाहे अपनेपन से देखो ( गजल )
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तुम्हें मेरा हाल जानने की जरूरत नहीं है/
अपना हाल बताने की मुझे फुरसत नहीं है/
किसी से मिलने की मुझे मनाही नहीं है,
दमे- गुलगश्त मुझे तुमसे उजरत नहीं है/
सलीका- ए- हुस्न अजब है, आँखों से पिलाते हैं,
उनकी जब- जब आँखे अश्कबार मिली है/
आँखो से आँसू गिरें या बह जाए कजरा,
मजबूर थे तुम, तो हमें भी तुमसे मुहब्वत नहीं है/
हजरते- वाइज ने न पीने की हिदायत दी है,
साकी ने भर-भर प्याले पीने की इजाजत दी है/
कहने को तो बड़ी दिलदार, बड़ी सूरमा थी तुम,
मुझे तुझसे कुछ कहने, माँगने की नीयत नहीं है/
दाल में कुछ काला या पूरी दाल ही काली है,
ये मसूर की दाल है हुजूर, कोई उड़द नहीं है/
मुहब्बत में बरबादियाँ तो हमीं दोनों की हुई है,
शिकस्ता बदन जरूर हूँ पर दिल मजरूह नहीं है/
वाइज को समझा, नमाज तो नहीं छूटी है,
भले गले में मेरे कोई तसबीह नहीं है/
तुझसे मिल पाने में भला हिचक मुझको कैसी,
तुझसे मिलने के लिए सनम, हम मशरूफ नहीं हैं/
चाहे अपनेपन से देखो या देखो हिकारत से,
' रतन ' को तुमसे कोई अदावत नहीं है//
राजीव रत्नेश

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