Sunday, November 8, 2026

फिर बाज़ार में

फिर बाज़ार में

कविता: राजीव रत्नेश ‘रतन’

भूमिका

“फिर बाज़ार में” एक अचानक हुई मुलाक़ात की कविता है। भीड़ भरे बाज़ार में नज़रें चार होती हैं और शायर को लगता है जैसे वह ख़ुद से मिल रहा हो। महबूब की याद, उसके बहाने, उसकी काली झिलमिल ओढ़नी और उसकी अदाएँ, सब मिलकर शाम के बाज़ार को रोशन कर देते हैं।
कविता में छेड़छाड़ और तंज़ भी है, तड़प और इंतज़ार भी। मुहब्बत चार रोज़ा है, दो दिन बीत चुके हैं, और शायर इस शहर में भी बस कुछ दिन का मेहमान है। वह नहीं जानता कि पाँचवें दिन महबूब आएगी या न मिलने की क़सम खा लेगी। फिर भी वह उम्मीद नहीं छोड़ता, और अंत में बस इतना चाहता है कि आँखों-आँखों में बात हो और बाज़ार रोशनियों से जगमगाता रहे।

कविता

बीच बाज़ार तुझसे नज़रें चार हुईं,
लगा ख़ुद से अपनी मुलाक़ात हुई,
सुबह से अब शाम होने को आई,
दिल के चमन में ख़ुशियों की बारात आई।

तुझसे मिलने की तड़प दिल में समाई,
आज भी आ जा, जैसे पिछले इतवार आई,
ज़िंदगी भर तेरी याद न जाएगी भुलाई,
तू अँधेरों की बस्ती में रोशनी बन छाई।

फिर तेरा बहाना कि अब तू न आ पाएगी,
जानता हूँ, बाज़ार में फबन दिखाने आएगी,
काली झिलमिल ओढ़नी ओढ़कर लहराएगी,
हसरत-ए-दिल होगी तो मुलाक़ात कर जाएगी।

कहाँ रहती है, किस शहर से तू आई,
कुछ ख़ास बात तूने न हमको बताई,
किस गली से निकलकर बाज़ार तक आई,
हम समझते-बूझते हैं सारी तेरी पारसाई।

फ़लक से सितारा टूटा कि तेरी याद आई,
जानेमन, क़िस्मत मेरी जगाने तू फिर आई,
हम ख़ुशियों के सागर में डूबते-उतराते रहे,
तू चाँद को झील में कैसे उतार लाई।

चार रोज़ा थी मुहब्बत, दो दिन गुज़र गए,
पाँचवें दिन आने की ठानी, या क़सम न मिलने की खाई?
इतना न तड़पा कि याद तेरी धुँधली हो जाए,
बाज़ार के हर दुकानदार ने तेरी राह में नज़र बिछाई।

तेरे शहर में कुछ दिन और है ठिकाना मेरा,
फिर किस ठौर तू होगी, किस ठौर अफ़साना मेरा,
मुझ नाचीज़ से दिल लगाने की भूल तुझसे हुई,
मैं बिस्मिल था, फिर भी ये ख़ता तुझसे कैसे हुई।

अब न और दूर रह, पास आ जा,
मोतियों की झालर से तेरी माँग सजाऊँ,
किसी तरह तेरे पास उड़कर आऊँ,
आरज़ुओं की गंगा में एक बार फिर नहाऊँ।

कहने को तू ग़ैर भी नहीं,
पर अभी तक मेरी अपनी भी नहीं,
आँखों में तेरे अश्क हैं, पलकों पे जुगनू,
माथे पे काली बिंदी है, गालों पे फागुन।

दिल दे न दे, हम खिलौनों से ही बहलते हैं,
तेरे नाम पर हर शाम मचलते हैं,
तेरी मस्तनिगाही का आलम ख़ुशगवार है,
आ जा सजनी, मुझे तुझी से प्यार है।

तेरे रुख़सारों की लालिमा क्या कहती है?
क्या तेरे नशेमन में मेरी कोई हिस्सेदारी है?
तू मेरा दिल, मैं तेरा दिलदार सनम,
आ जा आज, फिर कल शाम सनम।

तेरी-मेरी आँखों-आँखों में बात हो,
फिर बाज़ार में रोशनियों की बात हो।

शब्दार्थ

चमन: बाग़
बारात: विवाह-जुलूस (यहाँ ख़ुशियों का उमड़ आना)
फबन: शोभा, सजीली छवि
हसरत-ए-दिल: दिल की इच्छा
ओढ़नी: दुपट्टा, चुनरी
पारसाई: पवित्र दिखने का भाव (यहाँ भोलेपन का हल्का तंज़)
फ़लक: आसमान
जानेमन: प्राणप्रिय
चार रोज़ा: चार दिन की, क्षणभंगुर
क़सम: शपथ
नज़र बिछाना: बहुत उत्सुकता से राह देखना
ठिकाना: रहने की जगह, पड़ाव
ठौर: जगह, स्थान
अफ़साना: कहानी, क़िस्सा
नाचीज़: तुच्छ व्यक्ति (विनम्रता में ख़ुद के लिए)
बिस्मिल: घायल
ख़ता: भूल, चूक
झालर: लड़ियों की सजावट
आरज़ू: इच्छा, कामना
अश्क: आँसू
जुगनू: आग का कीड़ा (यहाँ आँखों की चमक)
फागुन: बसंत का महीना, गालों की गुलाबी रंगत
मस्तनिगाही: मस्त नज़र
आलम: दशा, माहौल
ख़ुशगवार: सुहावना
रुख़सार: गाल
नशेमन: घर, घोंसला
दिलदार: प्रेमी
सनम: प्रियतम

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