ग़ज़ल: राजीव रत्नेश ‘रतन’
भूमिका
“तेरे बाद ही ख़ुदा का ख़याल” एक ऐसे आशिक़ की ग़ज़ल है, जिसने महबूब को इबादत की हद तक चाहा। उसकी याद से ग़ज़ल का उबाल उठता है, उसके ज़िक्र से चेहरे पर रौनक आती है, और उसकी बेरुख़ी पर सफ़ाई देते-देते वह थक जाता है।
ग़ज़ल का केंद्रीय भाव यह है कि महबूब को ही पूजा गया, इसलिए ख़ुदा की याद उसके बाद ही आती है। मलाल है, पर शिकायत में भी समर्पण है। मक़्ते में शायर कहता है कि महबूब के दर से उठकर अब कोई राह नहीं बची, उसके बाद तो बस मौत का सवाल है।
ग़ज़ल
दिल में मेरे जब ग़ज़ल लिखने का उबाल आता है,
नज़र में तेरी चितचोर जवानी का जमाल आता है।
अक़ीदत-ए-मुहब्बत अब सिखाने से क्या होगा,
तुझे पूजा था, तेरे बाद ही ख़ुदा का ख़याल आता है।
सजदों में जिसके उम्र तमाम कर दी हमने,
उसे देखकर अब ख़ुद पे ही मलाल आता है।
दौर-ए-जुनूँ में तेरा कोई पैग़ाम जो पहुँचे,
लगता है साल बीतने के बाद नया साल आता है।
दुनिया की नज़रों में तो हम गुमनाम ही सही,
मगर तेरे ज़िक्र से चेहरे पर जलाल आता है।
किस-किस को सफ़ाई दें तेरी बेरुख़ी पर हम,
समझने वालों के लब पर बस मेरा ही हाल आता है।
‘रतन’ अब तेरे दर से उठने की राह क्या देखें,
कि तेरे बाद तो बस मौत का ही सवाल आता है।
शब्दार्थ
उबाल: जोश, भावनाओं का उमड़ना
चितचोर: मन चुराने वाली
जमाल: सौंदर्य, ख़ूबसूरती
अक़ीदत: श्रद्धा, गहरी आस्था
मुहब्बत: प्रेम
सजदा: माथा टेककर किया गया नमन, इबादत
मलाल: पछतावा, खेद
दौर-ए-जुनूँ: दीवानगी का समय
पैग़ाम: संदेश
गुमनाम: जिसे कोई न जाने
ज़िक्र: चर्चा, बात
जलाल: तेज, चमक, रौनक
सफ़ाई: स्पष्टीकरण
बेरुख़ी: उपेक्षा, बेपरवाही
लब: होंठ
दर: दरवाज़ा, चौखट
मक़्ता: ग़ज़ल का अंतिम शेर, जिसमें शायर का तख़ल्लुस आता है
तख़ल्लुस: शायर का उपनाम (यहाँ “रतन”)

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