साक़ी के पिलाने में
ग़ज़ल: राजीव रत्नेश "रतन"
भूमिका
यह ग़ज़ल हल्की शोख़ी और मीठी शिकायत का मिला-जुला रंग लिए हुए है। शायर कहता है कि साक़ी के हाथ के नशे का कोई दूसरा नहीं, और महबूब के नाज़-ओ-अंदाज़ तो उसकी कमज़ोर अक्ल के परे हैं। अटैची रख कर स्टेशन तक पहुँचने वाले नख़रे भी, अंत में, बस नख़रे ही रह जाते हैं। हर शेर का अंत इसी सवालिया लहजे पर होता है: "कहाँ होता है"।
रदीफ़ "कहाँ होता है" है और क़ाफ़िया "-आना" (पैमाना, मस्ताना, खाना, जाना, समझाना, दीवाना, बहाना, ठिकाना, लगाना, आना) है। मक़्ते में शायर "रतन" अपने साक़ी के मयख़ाने से बाहर किसी और दर पर न जाने की बात करता है।
ग़ज़ल
मतला
साक़ी के पिलाने में दम-ब-ख़ुद कर दे जो, वो पैमाना कहाँ होता है,
किसी और के पिलाने में वैसा मस्ताना कहाँ होता है।
२.
नाज़-ओ-अंदाज़ उनके समझ में बिल्कुल आते नहीं,
बिना बात जीने-मरने की क़सम खाना कहाँ होता है।
३.
नख़रे तेरे बाहर-ए-बयान हैं, मेरी कमज़ोर अक्ल से,
अटैची रख, स्टेशन पहुँच, फिर भी उनका जाना कहाँ होता है।
४.
दिल को लाख समझाया उनसे बचकर रहने को,
इश्क़ में दिल का समझाना कहाँ होता है।
५.
उनकी हर अदा पर मरना कोई नई बात नहीं,
उन पर मर मिटने वाला, हम-सा दीवाना कहाँ होता है।
६.
रूठना और मान जाना बस उनकी इक अदा है,
वरना उनके पास कोई और बहाना कहाँ होता है।
७.
सारी दुनिया घूम आए हम, पर तेरे दर के सिवा,
अपना कोई और ठिकाना कहाँ होता है।
८.
लुटा दिया इक नज़र पर हमने सारा ख़ज़ाना,
इश्क़ में नफ़ा-नुक़सान का हिसाब लगाना कहाँ होता है।
मक़्ता
साक़ी, तेरे मयख़ाने के बाद ऐ "रतन", किसी और दर पर,
मेरा और किसी महफ़िल में आना कहाँ होता है।
शब्दार्थ
- साक़ी: महफ़िल में शराब पिलाने वाला/वाली
- दम-ब-ख़ुद: हक्का-बक्का, स्तब्ध
- पैमाना: शराब का प्याला
- मस्ताना: मस्ती से भरा, नशीला
- नाज़-ओ-अंदाज़: नख़रे और अदाएँ
- क़सम: शपथ
- नख़रे: नाज़-नख़रा, अदाओं का दिखावा
- बाहर-ए-बयान: बयान से परे, वर्णन से बाहर
- अक्ल: बुद्धि, समझ
- अटैची: सूटकेस, यात्रा का बक्सा
- अदा: नाज़-ओ-अंदाज़
- ठिकाना: अड्डा, आश्रय
- ख़ज़ाना: कोष, भंडार
- नफ़ा-नुक़सान: लाभ और हानि
- मयख़ाना: शराबख़ाना
- महफ़िल: सभा, जमघट
- मतला: ग़ज़ल का पहला शेर, जिसके दोनों मिसरों में क़ाफ़िया-रदीफ़ आता है
- मक़्ता: ग़ज़ल का अंतिम शेर, जिसमें शायर का तख़ल्लुस आता है
- क़ाफ़िया: तुक वाले शब्द
- रदीफ़: हर शेर के अंत में दोहराया जाने वाला पद
- तख़ल्लुस: शायर का उपनाम

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