फ़र्ज़-ए-मयकदा
ग़ज़ल: राजीव रत्नेश 'रतन'
भूमिका
"फ़र्ज़-ए-मयकदा" एक शिकायत-भरी ग़ज़ल है, जिसमें शायर अपने महबूब से कहता है कि जो निभाना था, वह निभाया नहीं गया। मयकदे का फ़र्ज़ है पिलाना, और अगर साग़र न हो तो आँखों से ही पिला दिया जाता। यहाँ मयकदा प्रेम का प्रतीक है और पिलाना अपनापन देने का।
पूरी ग़ज़ल में "होता" की रदीफ़ एक अधूरी हसरत की तरह लौटती है: काश किसी ने सहारा दिया होता, दीया जलाया होता, गले लगाया होता। शिकायत के बावजूद कड़वाहट नहीं है। सितम के दौर में भी चाहत कम नहीं हुई, और मक़्ते में शायर बिछड़कर भी वफ़ा के एक सिलसिले की उम्मीद रखता है।
ग़ज़ल
पिलाना फ़र्ज़ था, कुछ तो पिलाया होता,
सागर नहीं था तो आँखों से पिलाया होता।
नज़र के जाम से छलकती रहीं ये रातें,
किसी ने तो आँख से दरिया बहाया होता।
तर्कों में उलझकर उम्र गुज़ारी हमने,
तकरार के सिवा काश! कोई पैग़ाम आया होता।
चराग़-ए-शाम पलकों पर रखा था हमने,
हवा के रुख़ से किसी ने तो बचाया होता।
अँधेरे घर में बस जुगनू की आस रही हमको,
किसी ने एक दिया तो जलाया होता।
सितम के दौर में भी चाहत तेरी कम न हुई,
फ़ासला भूलकर हमें गले लगाया होता।
ज़िंदगी से बढ़कर भी तुझको तरजीह देते हम,
घड़ी भर के लिए तूने तरस खाया होता।
ज़माने भर के सब ज़ुल्म भुला देते हम,
ज़रा सहारा देकर तूने अपना बनाया होता।
'रतन' यूँ न उदास होता तुझसे बिछड़कर भी,
वफ़ा का कोई तो सिलसिला निभाया होता।
शब्दार्थ
फ़र्ज़: कर्तव्य
मयकदा: मदिरालय, मधुशाला
साग़र / जाम: प्याला, मदिरा का पात्र
नज़र: निगाह, दृष्टि
दरिया: नदी
तर्क: दलील, बहस
तकरार: झगड़ा, वाद-विवाद
पैग़ाम: संदेश
चराग़-ए-शाम: शाम का दीया
रुख़: दिशा, ओर
जुगनू: आग का कीड़ा (यहाँ रोशनी की हल्की-सी उम्मीद)
सितम / ज़ुल्म: अत्याचार, अन्याय
दौर: समय, काल
फ़ासला: दूरी
तरजीह: प्राथमिकता, वरीयता
वफ़ा: निष्ठा, निभाने का भाव
सिलसिला: क्रम, लगातार चलने वाली कड़ी
मक़्ता: ग़ज़ल का अंतिम शेर, जिसमें शायर का तख़ल्लुस आता है
तख़ल्लुस: शायर का उपनाम (यहाँ "रतन")

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