शब को संवारने की खातिर ( गजल )
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मुझे सिरे से नकारने वाले, तेरी याद सताए/
कर कुछ ऐसा धमाका, मेरी आँखों की नींद जाए/
बुलाता हूँ तुझे, पर आना तेरे अधिकार में रहे,
मैं किस तरह तुझे बुलाएँ, बिनआए रहा न जाए/
कहाँ गई वो महफिल, दिन के सब किस्से तमाम हुए,
दिन का' आहा', रात का' ऊहूं सिलसिले से तबाह हुए/
जब से गई हो मेरी जिंदगी से, किस्से तेरे- मेरे बर्बाद हुए,
अरसा गुजरा, अपने फलसफे में तुझे किरदार किए/
मुहब्बत का दर्द कुछ यूँ मेरी नजर से फिसला,
न चाहूँ फिर भी, दिल तेरी सौगात न भुलाए/
छोड़ दिया तुझे, न पूछा कुछ तेरी खस्ताहाली में,
हरचन्द यार तेरा, हर गाम मुझसे दुश्मनी निभाए/
ऐसी भी क्या दुश्मनी मुझसे कि और दूर जाए,
दुपट्टे को संभाले, नजर से मेरी खुद को छिपाए/
मेरी आँखों के सामने, बिजली कौंध- कौंध जाए,
ये कौन है, जो आँधियों में मेरे दिल के चिराग जलाए/
बला की गर्मी है और खामोशी तेरी यूँ इस कदर,
मुझसे तो सब्र होता नहीं, आकर तू ही मुझे समझाए/
मुहब्बत जबसे खिलाफत पे उतारू हुई, खिलाफ हुआ जमाना,
हमसे किसी ने न कहा', आओ, साथ बैठ दो पैग चढ़ाएँ'/
एहतियात बहुत किए, जतन भी मिलने को किए,
मिलने को हुई तैयार तो यार मेरे खिलाफ भड़काए/
सोहबतों के बीच हुई थी, तेरे- मेरे बीच अदावत पैदा,
अब क्या तू एक और चौकड़ी नई- नई बनाए?
जिंदगी भर के साथ का वादा तो तुझी ने किया था,
मैंने कब तेरी बात को किया दरकिनार, तू ही बताए/
पुराने गिले-शिकवे भूल, इक बार तू पलट कर आए,
कम से कम आखिरी बार तो तू मुझे फिर से आजमाए/
मीठे में तु भी जानती है कि चींटे- चीटिंया लगते हैं,
मुहब्बत हद से गुजरती है तो पहचान में न आए/
मेरे दिल पे गुजरती है तो भड़ास कागज पे उतारता हूँ,
तू कैसे वक्त अपना गुजारे, कैसे खुद को बहलाए/
जर्जर कश्ती थी, बीच भंवर में दम आखिर तोड़ गई,
पतवार हाँलाकि नई थी, आस- पास ही थे किनारे/
लब- कुशाई तो बहुत हमने अपने जख्मे- दिल की देखी,
खुदा वो दिन भी आए, कि तू जख्म का भरना दिखाए/
जाल फेंक कर काली घटाओं में हम भी तमाशा देखें,
हमारी बाहों में चांद हो, हमसे उसका तड़पना न देखा जाए/
शब को संवारने की खातिर' रतन', तुझे तो जाना ही था,
भले ढ़लती शाम में उनको निहारना खुद ही छूट जाए/
राजीव रत्नेश
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राजे- इश्क आशकार कर, तुमने सोचा,
मशहूर हो जाओगे सारे जमाने में/
खुद ही तुम, अपने हाथों आग लगा बैठे,
अपनी मुहब्बत के आशियाने में//
राजीव रत्नेश
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मेरी जिन्दगी में बाहर के भी तमाम अफसाने हैं,
मेरी बस्ती में जले दिलों की कई दुकाने हैं/
गम को सीने से भींच कर हम तो लगाए बैठे हैं,
पिघलती हुई शाम के बाद के, अपने सारे नजराने हैं//
राजीव रत्नेश
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किनारे पास थे, फिर भी भँवर ने कश्ती को डुबा दिया/
रतन ने कागज पर उतार कर, जमाने को अपना हाल सुना दिया//

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