तुम्हारे रुबरु ( कविता )
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तेरी पहली मुलाकात के बाद तुझसे फरियाद करता हूँ/
दिल से आह निकलती है, जब जब तुझे याद करता हूँ/
पहली बार तूने अपनी बुआ का डान्स दिखाने का लालच दिया ,
दूसरी मुलाकात में अपना पता- ठिकाना तक बता
दिया/
तुझसे मिलने को बेकरार होकर जब मैं तेरे ठिकाने पर
पहुँचा,
अपने साथ तूने मुझे भी अपना हमजाद ठीक समझा
दिया/
तुझी को देख कर मेरी सुब्ह से शाम, शाम से रात होती थी,
शाम को बारहा तू मेरे साथ होती थी, साथ ही मेरे सोती थी/
गाफिल न था तेरी अदाओं से, दिलो- जां तक हार गया,
दीवानी मेरी पहले हुई, फिर मुझे भी दीवाना बना दिया/
मैंने तेरी एक बात गौर की थी कि बात करते वक्त पहले हँसती थी,
फिर वाक्य बोल कर हँसती थी, फिर बात पूरा करती थी/
किसी से भी बात करते वक्त, नजरें सीधे उस पर होती
थीं,
तू सबसे बात करते वक्त, शुरू से आखिर तक मुस्कराती थी/
कुछ दिनों तक तुझे देखा समझा, दिल को समझाया पर दिल न माना,
थक हार कर तब तेरे पीछे , ' प्राइवेट- डिटेक्टिव ' को
लगाया/
दो महीने बाद उसने तेरी बाबत मुझे अपनी खुफिया रिपोर्ट दी,
तेरी वह आदत कुछ नहीं बस वो तेरा तकल्लुम आम
थी/
उसने बताया मुझे मेरी सावधानियाँ फालतू और निर्मूल थीं,
मैं फालतू में तुम्हारे पीछे तर्कहीन सा शंकाशील था, तू पाक - साफ थी/
उसके सामने अहसासे- गैरत से मैं जमीं में गड़ सा गया,
वह मुझे सांत्वना देकर वापस अपने काम पर लौट गया/
पहले मुझे खासा अखरता था, पर दुनिया गोल है,
समझ गया,
दुनिया इधर की उधर हो जाए, पर साथ मेरा छोड़ तू
कहीं न जाएगी/
इलाहाबाद की जमुना से लेकर बलिया की सरयू तक
तेरा बोल बाला था,
मुस्करा के तू जिसे देख लेती थी, वो दिल हार जाता
था/
अपने पापा से तुझे माँगने को तुम्हीं ने मुझे उकसाया था,
सच बात ये थी कि तेरे बिना, मैं भी रह नहीं सकता
था/
ऐसे ही बलिया का लंबोतरे चेहरे वाला एकमात्र रिपोर्टर था,
जो तुझसे मिलने को, सवालों की बौछार लिए रोज चला आता था/
कुछ तो इधर- उधर की, उससे ज्यादा हालाते- गमे- दिल बतलाता था,
दाल न गल पाने का जब यकीन हो गया, तो खुद ही
अंतर्रध्यान हो गया/
उसके बाद वह सर पे पैर रख कर भागा तो इस तरह
भागा,
हमारे अभियान के बाद तक फिर वह हमारे सामने न
आया/
वैसे मुझे उसको फटकारने की वैसी कोई खास वजह
तो न थी,
तुम्हारी डाँट से ही वह पुरइन के पत्ते की तरह डोलता
था/
तुम पूरी तरह से मेरी जिन्दगी में पेवस्त हो चुकी
थीमेरे भरोसे ही तुमने अपनी जवानी के खूबसूरत पल
निसार दिए थे/
मेरे साथ साथ ही लम्बे-लम्बे टूर पर तुम जाया करती
थी,
आधे हिन्दुस्तान से ज्यादा और पुरा नेपाल तुम घूम
चुकी थी/
अक्सर मैं तेरी आँखों में तिरती जमुना को झाँक लेता
था,
और एक नये उत्साह, नई जागृति से आँखों को भर
लेता था/
जो मैं खाता पीता था, तुझे भी वही मयस्सर होता था,
इस बात की तुमने कभी भी शिकायत किसी से न की/
अपने माँ- बाप से मिली, तो उनसे भी कुछ न कहा,
मौका ठीक समझ, मैंने तुम्हारे पापा से तुम्हारा हाथ माँगा/
जिस अभियान से मेरी, धेले भर की कमाई भी न होती थी,
उसी में पूरा वक्त लगाने की जोरदार फर्माइश तुमने की थी/
उसके वालिदैन बिना किसी हीला-हवाली के मान गए,
इसी बहाने एक बार मेरे वालिदैन से भी मिल गए/
वह मेरे कास्ट की थी, बीच में कोई पेचो- ताब न फँसा,
उसकी ' डेट आफ बर्थ ' मैं आज तक भी नहीं जानता/
सर्टिफिकेट से उसकी डेट आफ बर्थ मुझे कुछ यूँ मालूम हुई,
जब उसने मुझे बताता, अमूनन वह मुझसे नौ साल
कम उम्र है/
न मेरी तरफ से जन्म-पत्री माँगी गई, न तुम्हारी तरफ
से दी गई,
किसी ने कुल गोत्र भी न देखा, न पूछा ही किसी पंडित जानकार ने/
मनमर्जी की शादी थी या ये सिर्फ दो सितारों का ही
मिलन था,
कौन पूछता मेरी पियरी को या तेरी शादी के लाल
जोड़े को/
रतन को अपनी कोरव से तीन रत्न सौंप निहाल कर
दिया,
पूजा, तनू और प्रांजू, यही मेरी मिल्कियत सारी सजा
दिया/
मैंने तुमसे तुम्हारी बुआ को डान्स दिखाने को कभी
नहीं कहा,
तुम बोलीं, ' आप कुछ न कहें, मुझसे अच्छा डान्स नहीं करती हैं '/
मैंने कहा तुमसे, ' अब किसी दिन अपना डान्स दिखा
ही दो ',
तुमने हँस कर कहा, ' मेरी अदा- ओ- नाज से क्या अभी तक नहीं रीझे '/
मैंने कहा, ' अब तुम्हें नचाना क्या मुझे अब भी अच्छा
लगेगा,
तुम्हारे साथ कहीं भी घूमना ही मुझे अब तो बस रास
आता है '/
मेरे साथ तुम्हारा बाग-बगीचों, खेतों-खलिहानों में घूमना बदस्तूर जारी है,
ऐसे में नजर लग जाती है, अपने को अभी भी तू बाली उमर का ही तो समझती है//
राजीव रत्नेश
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किसी की प्रतिक्रिया जानने की जरूरत क्या है,
वे मेरी औलाद हैं, इसके सिवा कोई ज्यादा जानता नहीं है/
साथी जो साथ निभाए, तो सामने की मजबूरियत क्या है,
खासी निभ रही है, जमाना उंगली उठाने के सिवा कुछ जानता नहीं है/
राजीव रत्नेश
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