बस तुम्हारे घर की तरफ ( कविता )
++++++++++++++++++++++
जान जोखिम में है, जबसे तुमसे इजहार किया/
रास्ता चलना हुआ मुश्किल, जो प्यार किया/
ये क्या हुआ, दुपट्टा गले का सर पे डाला,
एक नजर से देखा मुझे, दूसरी से आँख मारा/
इंतजार में तेरे किसी तरह सुब्ह से शाम किया,
तुम आओगी, ये जान कर अब्बू को तुम्हारे सलाम किया/
तुम्हारा अब्बू सब कुछ या तो पहले से जानता था,
या फिर मुझे किसी तरह वो भाँप गया/
दिन में सितारे तो कभी नजर न आए थे,
आज भरी दुपहरिया में चांद उगा, सितारा उगा/
किस तरह रूठ कर थोबड़ा अपना बिगाड़ लिया,
बीच सड़क तमाशा किया, सड़क जाम किया/
मैं जानता था, हम सी० सी० टी० वी० की जद में हैं,
इसीलिए चुप लगाया, खुद से न कोई हंगामा काटा/
तेरी तस्वीर को कलेजे से लगा सिर्फ आहें भरता हूँ,
किसी तरह आँखों ही आँखों में रात गुजारा/
एक लिफाफा भेज दिया तुमने मेरे नाम,
कौन है? कैसी है? कहाँ की है, मेरे वालिदैन ने पूछा/
हैरान है ' रतन ', अब किसको क्या बताए,
गुपचुप तुम्हारे घर की तरफ किया इशारा/
राजीव रत्नेश
""""""""""""""""""""""""""
सी०सी ० टी० वी० के डर से सड़क पर तो
हंगामा बचा लिया,
पर लिफाफा भेज कर महबूब ने वालिदैन के
सामने फँसा दिया /"
आशिकी में आखिर डर कैसा, गर इजाजत मिली होती,
दामन तो थामा ही था, हाथ भी उसका थाम लेता/
थोबड़ा बिगाड़ कर आने की बजाय, जो मुस्कराई होती,
उसकी जुल्फों के साये में, सुब्ह से शाम कर लेता/
राजीव रत्नेश
"""""""""""""""""""''"""

No comments:
Post a Comment