Saturday, July 11, 2026

बस तुम्हारे घर की तरफ ( गजल )

बस तुम्हारे घर की तरफ  ( कविता )
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जान जोखिम में है, जबसे तुमसे इजहार किया/
रास्ता चलना हुआ मुश्किल, जो प्यार किया/

ये क्या हुआ, दुपट्टा गले का सर पे डाला,
एक नजर से देखा मुझे, दूसरी से आँख मारा/

इंतजार में तेरे किसी तरह सुब्ह से शाम किया,
तुम आओगी, ये जान कर अब्बू को तुम्हारे सलाम किया/

तुम्हारा अब्बू सब कुछ या तो पहले से जानता था,
या फिर मुझे किसी तरह वो भाँप गया/

दिन में सितारे तो कभी नजर न आए थे,
आज भरी दुपहरिया में चांद उगा, सितारा उगा/

किस तरह रूठ कर थोबड़ा अपना बिगाड़ लिया,
बीच सड़क तमाशा किया, सड़क जाम किया/

मैं जानता था, हम सी० सी० टी० वी० की जद में हैं,
इसीलिए चुप लगाया, खुद से न कोई हंगामा काटा/

तेरी तस्वीर को कलेजे से लगा सिर्फ आहें भरता हूँ,
किसी तरह आँखों ही आँखों में रात गुजारा/

एक लिफाफा भेज दिया तुमने मेरे नाम,
कौन है? कैसी है? कहाँ की है, मेरे वालिदैन ने पूछा/

हैरान है ' रतन ', अब किसको क्या बताए,
गुपचुप तुम्हारे घर की तरफ किया इशारा/

             राजीव रत्नेश
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सी०सी ० टी० वी० के डर से सड़क पर तो
हंगामा बचा लिया,
पर लिफाफा भेज कर महबूब ने वालिदैन के
सामने फँसा दिया /"

आशिकी में  आखिर डर कैसा, गर इजाजत मिली होती,
दामन तो थामा ही था, हाथ भी उसका थाम लेता/
थोबड़ा बिगाड़ कर आने की बजाय, जो मुस्कराई होती,
उसकी जुल्फों के साये में, सुब्ह से शाम कर लेता/

                 राजीव रत्नेश
              """""""""""""""""""''"""

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