तुझे पेश सारा जमाना कर बैठे ( गजल )
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तोड़ना था रिश्ता तुमसे, पर मिलने का वादा कर बैठे/
तुम्हारी तरबीयत ऐसी कि पेश तुम्हें दो- जहाँ कर बैठे/
बाप तुम्हारा मेरी जान लेने पे आमादा, उससे दूरी बना बैठे,
भँवर में थी कश्ती, तुम्हीं से मुहब्बत- ए- दिल में किनारा मिला बैठे/
मुश्किल में डाल गए आज तो मुझे तो मुश्किल में,
ध्यान तुम्हारा था, तुम्हीं को इशारा कर बैठे/
आँखों में ही तुम रहे, दिल में आ कर नहीं देखा,
मैं बुझता शमां था, तुम मुझे बुझाने का इरादा कर बैठे/
महफिल की तेरे जलती- बुझती रौशनियों के तले,
हम नाक की सीध में चल आबाद तेरा मैरवाना कर बैठे/
पिलाना चाहा जाम तुमने हर रिन्द को, जो जैसा हो,
प्यासे कब के थे, तुम्हीं से तगादा कर बैठे/
परदेश से लौट कर तेरी गोद में सर रखूँगा,
अहसास ये पुराना था, हसरते- दिल तुमपे आजमा बैठे/
यकीनन तेरी तपिश- ए- मुहब्बत, बाहिरे- बरदाश्त थी,
तुरबत पे मेरी आके पिलाओगे, तुम ये वादा कर बैठे/
हद से बढ़ती है मुहब्बत तो पहचान से भी जाती है,
सरे- शाम तुमसे मिलने की आस में, तुम्हारा आसरा कर बैठे/
मेरी मुहब्बत मिलन के लिए तुझे हमेशा न्यौता देती है,
तेरे लिए ही, तुझे सुपुर्द ये जमीनो- आस्मां कर बैठे/
खुदा की नेमत है तेरा हुस्नो- शबाब, रंगत- ए- गुलाब,
इसके एवज में ' रतन ' तुझे पेश सारा जमाना कर बैठे//
राजीव रत्नेश
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मिलने का वादा वो कर तो बैठे,
मैंने पूछा कहाँ? तो बोले ख्वाबों में/
फिर-फिर पूछा, ' गुजरगाहों में क्यों नहीं '?
हँस के बोले, ' नजर न लगे " नवाबों " की//
राजीव रत्नेश
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चाल चलने में औरतों का जवाब नहीं होता,
यह जमाना कभी किसी का मोहताज नहीं होता/
एक प्यादा भी चलता सीधा पर मारता तिरछा है,
अदा- ओ- नाज उनका शतरंज की बिसात नहीं होता/
राजीव रत्नेश
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