मेरे सब्र का दामन छूटा ( गजल )
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दरकिनार कर अपनी खुद्दारी, तुझे मनाने चला हूँ/
तेरी दहलीज पर फिर एक बार आसन जमाने चला हूँ/
मान- मनौव्वल ही कर सकता हूँ, तेरा मानना आसां नहीं,
खुद अपनी कश्ती, तेरे साहिल पे लगाने चला हूँ/
पहले की तरह तू बरहना- पा साहिल पे न आएगी,
तेरे लिए ही बस, तेरी चौखट पे सर झुकाने चला हूँ/
जानता हूँ अब तू, मुझसे ही परदा भी करेगी,
यही सोच, फिर भी तुझे अकेले में बुलाने चला हूँ/
जानता हूँ तेरा बाप, हुक्का गुड़गुड़ा रहा होगा,
उसे इत्मीनान की साँस देने, तुझे माँगने चला हूँ/
अगर वह मजबूर न होता, उसकी बिटिया मेरी न होती,
जमाने की जहालत से उसे आज बचाने चला हूँ/
मेरी मोहब्बत पर तूने नाकामी का चोला डाला है,
मुझसे सब्र का दामन छूटा, तुझे वापस लाने चला हूँ//
राजीव रत्नेश

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