Friday, July 11, 2025

जोश में तो रहो( कविता)

माना आज कल परेशानी में हो बहुत,
इतनी है गुजारिश मगर होश में तो रहो/
अच्छा नहीं यूँ खुद को भी भुला देना,
गुस्ताखी- ए- गैर के लिए खुद को सजा देना,
जिन्दगी इक जाम भी है जहर भी है,
क्या है जरूरत जाने- जहर होंठो से लगा लेना/
खिजाँ को मुहलत है थोड़ी देर को ही,
थामने को दामने- बहार जोश में तो रहो//
मस्त नजर अब वो रौनके- रुख क्यूँ नहीं,
तड़प औ' बेहाली का आलम, दिल का सुकूँ क्यूँ नहीं?
अफसुर्दा- अफसुर्दा सी नजर आती हो आजकल,
अब अदा- ओ- जल्व- ए- सितम का जनूँ क्यूँ नहीं?
इजहारेदिल की बेपर्दगी के अफसोस में तो रहो,
बहारों में घूमो, नज्जार- ए- शौक में तो रहो//
जिन्दगी नहीं है सिर्फ टुकड़ों में जीना,
नहीं है खुशी जामेगम में खुद को डुबो देना,
तुम्हारे जैसे गमे मुहब्बत मेरे साथ भी हैं,
नफस रुक-रुक के भले चले, न सदा- ए कजा देना/
न रहो तनहाँ, हमेशा महफिले शोख में तो रहो,
हँसती रहो सदा मूड- ए- जोक में तो रहो//
फिर तेरी महफिल में रंगों की छटा छाएगी,
जुल्फ तेरी लहराएगी तो फिर घटा छाएगी,
होठों पे थिरकती है क्यूँ सदा- ए- सहरा,
फिर तरन्नुम मचलेंगे, उल्फत की सदा आएगी/
कैसे मिलेंगे हम फिर होली, इस सोच में तो रहो,
बेलने के लिए फिर पापड़, आलमे मयनोश में तो रहो//
         राजीव रत्नेश
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