मुहब्बत ने यूँ करवट बदली, लौट के अपने शहर ही आए/
माना कि तेरे शहर में रंगीनियाँ थीं,
शहर के जल्वों में भरी शोखियाँ थीं,
यारों की महफिल महफिल से चुपचाप आए,
हाँलाकि तेरे शहर में ज्यादा मस्तियाँ थीं,
बदन शीशे का बचा, पत्थरों के शहर से हम पलट आए/
मुहब्बत ने यूँ करवट बदली, लौट के अपने शहर ही आए/
मौजूद तू अपने शहर, हाले- दिल न पूछा,
कुछ दिन तो हमने तेरे शहर में बिताए,
यह कम नहीं, होठों पे तेरे जो चुप्पी है,
हम जलजला उठा कर तेरे शहर से आए,
कागजी फूलों की खुशबू से परहेज था हमको, तेरे शहर से आए/
मुहब्बत ने यूँ करवट बदली, लौट के अपने शहर ही आए/
मंजूर न था तेरे शहरे- मस्त का मौसम मुझको,
तेरे दिल को याद अपनी दे के चले आए,
तेरी अदा- ओ- नजाकत से ऊब हो गई थी मुझको,
तेरी परेशानियाँ हम साथ ले के चले आए,
सहज था रहन- सहन अपना, लौट के अपने शहर ही आए/
मुहब्बत ने यूँ करवट बदली, लौट के अपने शहर ही आए/
न निभाना था तुझे, तो बुलाया ही क्यूँथा?
नादान- दिल को अपना बनाया ही क्यूँ था?
मुहब्बत के अफसाने के रूबरू किया ही क्यूँ था?
मेरे साथ- साथ गैर को बुलाया ही क्यूँ था?
मुहब्बत में तेरे माथे पे शिकन छोड़ कर ही चले आए/
मुहब्बत ने यूँ करवट बदली, लौट के अपने शहर ही आए//
राजीव रत्नेश
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