Sunday, July 13, 2025

तेरा घर छोड़ के मुझे जाना होगा --- कविता

अपना बसा- बसाया घर, छोड़ के मुझको जाना होगा/
किसी दूसरे शहर के, उजड़े मकां में डेरा जमाना होगा/
जहाँ तेरी याद न सताए, आ- आकर मुझको,
मुझे वैसी जगह जाकर अपना नया आशियाना बनाना होगा/
रुठी है तो रूठी रहना, अपनी तनहाइयों के साथ तुम,
प्यार की उठती, नई अपनी रानाइयों के साथ तुम
नजरे- बेबाक से, हर किसी का इस्तकबाल करना,
हर किसी को अपना समझना, अपनी अँगड़ाइयों के साथ तुम,
तेरी अदा- ओ- नजाकत की दुनिया छोड़, दूर कहीं जाना होगा/
अपना बसा- बसाया घर छोड़ कर मुझको जाना होगा/
मैंने सोचा भी नथा, इतनी बेगैरत हो जाओगी तुम,
अपनी कमसिनी को छोड़ कर, सही मायने में औरत हो जाओगी तुम,
ख्याल मेरा दिल से निकाल कर, और की हो जाओगी तुम,
रास्ता छोड़ के मंजिल का, राह से भटक जाओगी तुम,
दर्द तूने दिल को दिया है, उससे निजात मुझे पाना होगा/
छोड़ कर तेरा ठिकाना, मुझे अपना नया ठिकाना बनाना होगा/
दर्द जुदाई का मुझे सहना है, सह लूँगा किसी भी तरह,
भावनाओं में न बहूँगा अब मैं, समंदरों की तरह,
चाँद की मुहब्बत में, बदल देता है रोज अपनी राह,
मैं भी भुला दूंगा तुझे, न मिलूँगा अब अपनों की तरह,
इस दिल पर इकतरफा, तुझको कयामत करना होगा/
हँसते-मुस्कराते हुए, मुझे दिल से जुदा करना होगा/
तेरे दिए दर्द से तनहाइयों में न तड़पूँगा मैं, अब किसी तरह,
मुहब्बत तेरी याद कर अँगड़ाइयों में, न समेटूँ गा बदन किसी तरह,
अपना न समझा तूने, नहीं है तुझसे इसकी शिकायत मुझको,
तेरी याद की निशानियों से, अब न बदलूँगा किसी तरह,
पुरानी बोतल पे नया लेबल लगा के, सबको पिलाना होगा/
अपना बसा- बसाया घर, रतन, तुम्हें छोड़ के जाना होगा/
          तुरंत होश में, मैं आया कैसे?
          देखा तो सामने तेरा मुखड़ा था/
          मदहोश भी तूने ही किया था,
          पिला के जाम, दिखा कर चेहरा अपना/
                राजीव रत्नेश
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