Sunday, July 13, 2025

रतन को मुहब्बत अपने चाँद से( कविता)

तेरे लिए एक नजरे- उल्फत, एक- एक मशक्कते- उल्फत ही सही,
अब तो आ जाओ महफिल में, तुम्हारा कहीं अब ठिकाना भी नहीं/
तुम्हारे बिना कोई पुरसाहाल नहीं, आके मेरे दिल में समा जाओ,
कोई रहा भी अपना नहीं, रहा तेरी नजरों का निशाना भी नहीं/
गरीबों का बसर, बज्मे- शाही में किसी मतलब का हुआ ही नहीं,
क्या मानें तेरी अपनी मुहब्बत का, मुझे अब कोई दावा भी नहीं/
उस पर उल्फत तेरी गुल खिलाए जाती है, लगती तबीयत भी नहीं,
मुहब्बतों का मेरी असर कुछ तुझ पर हुआ ही नहीं, मिलने का मेरा इरादा भी नहीं/
तेरी अजमते- दिल की दुनिया से ऊपर, हो गया कोई हमसफर ही सही,
मर्जी हो तो पास आके मुझे समझाओ, तेरी मम्मी का हुआ कोई इशारा भ नहीं/
उल्फत तेरी खिलखिलाती है, बज्म में उठ्ठा कोई जलजला भी नहीं,
क्या मानें तेरे हाले-दिल का, दिल में जो आए कर, होंगे मेरे होश फाख्ता भी नहीं/
आ- आ के देख ले बार- बार अपनी मुहब्बत की निशानी,
अपना हाले-दिल तुझको ही दिखाऊँ, मुहब्बत का अपनी ठिकाना भी नहीं/
करामाती है तू, तेरी जवानी भी मदहोश करती है, तेरी निशानी ही सही,
इक बार आके चेहरा ही दिखा, गैर की कब हो गई? दिया अपना अता-पता भी नही/
आ जाओ तेरी अस्मत से खेलने की है किसकी हिम्मत,
यकीं नहीं मुहब्बत का, क्या अभी जोशे- सलामत अपने दीवाने का भी नहीं/
न तुझे होश था, न अपनी दीवानगी का ही होश है अभी भी मुझे,
उस पर तुर्रा ये है कि वो मानते ही नहीं, तारी है उल्फते- करीना भी नहीं/
आके पास देख ले, कोई तेरे साथ खेलेगा न दिलगिरी से तेरे,
फरिश्तों का शहर ये, हुकूमते- शाही चलती नहीं, बिना पूछे सूरज चढ़ता भी नहीं/
आ जाओ याद तुझे हम भी करते हैं, अभी तुमको याद मेरी नहीं,
जो याद तेरी दिलाए, साथ मेरे कोई खुदा का बंदा भी नहीं/
ये रात मेरी भी रात नहीं, तेरे बिना गुजरती भी नहीं,
किसी दूसरे को बरदाश्त करने का अब मेरा इरादा भी नहीं/
" रतन" की भी यही मर्जी, साथ बिना लिए तुझको जाना नहीं
जज्बात तेरे मेरी तरह घायल नहीं, वक्त अपना पासवाँ भी नहीं//
                 राजीव रत्नेश
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         तू और कुछ जानती नहीं,
         प्यार में हुज्जत के सिवा/
         नफरतों की भाषा तूने सिखाई,
         आता ही क्या था, मुझे मुहब्बत के सिवा//
                   राजीव रत्नेश
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