तेरी महफिल में आखिरी रात है साकी/
तू ही आगे बढ़ आ, शीशे से शीशा टकरा,
तेरे हाथों में जाम, मेरे लब पे प्यास है बाकी/
हर लम्हा रहे तू खुश, इसी में मेरी खुशी है,
दिले- पजमुरदा को रात का इंतजार है साकी/
होश खोया था तेरी महफिल में आके ही,
जाते-जाते जामे- लब पिला दे साकी/
गुजरे जमाने ने फिर करवट बदली है,
अब तो तू पास आ जा फिर से साकी/
गलीचा- गलीचा अपने नसीब को सराह रहा,
दे दी तूने जो अपने पाँव की है निशानी/
तू फलक से उतरी परीजाद साकी,
आ जा अब दिल में तेरा ख्याल है बाकी/
राजीव रत्नेश
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