Thursday, June 18, 2026

उतार देते अहसान सभी ( गजल )

उतार देते अहसान सभी  (गजल )
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मुझे याद आने वाले, किस बात का बदला चुकाए/
खुद ही किया घात मुहब्बत में, खुद फैसला सुनाए/

हमको मुहब्बत की बरबादी का मंजर नाकुबूल था,
कहाँ भटक गए हो, मंजिले- मुहब्बत के रखवाले/

देख न अभी से उस पार का मंजर, अगर हासिल सुकूं है,
कश्ती तो पहले उस पार के मुसाफिर उतार के आए/

तेरे पैकर को समझते- समझते ही उम्र तमाम हुई,
नक्श पहले अपने पहले कैनवस पर तो उतरवाए/

जमाने ने हमें नंगी तलवार पर चलने की सजा दी,
तेरी तरह राजसी तामझाम न थे, न कभी जमीं पे सोए

ये दस्तूरे- कुदरत है, गिरते पत्ते साल में इक बार,
एक जमाना बीता, मेरी आँख को आँसू गिराए/

मैं तेरे लिए इक रहगुजर ही तो सिर्फ रह गया,
सदियाँ बीतीं, तुझे इस पर बोझ अपना उतारे हुए/

मुझको दरपर्दा सुनाता रहा तू किस्सा अपना ही,
दादी, नानी के किस्से तो, बीते जमाने सुनाए हुए/

लुटा चुका हूँ अपना सब कुछ, किया तेरे प्यार के हवाले,
मुझ दरवेश के दर आए भी गर, तो अब सिर्फ दुआ ही
पाए/

तूने मेरी खाक तो पहचानी थी, खुशबू न पहचान पाई,
दिल के अरमानों की विरासत किया था तेरे हवाले/

जाना न महफिल से चंदा, तुझे दिल का आस्मां पुकारे,
तुझे पाने के वास्ते, जाने कितने तेरे गुनाह हमने छुपाए/

सब सुलझ जाएगा, सुलझ जाएँगे तेरे- मेरे अफसाने,
इक बार सब भुला कर, मिलने के मुझसे कर इरादे/

आओगे खुद पलट कर, उम्मीद' रतन ' अब भी करता है,
उतार देते अहसान सभी, जो कुछ तुमने थे मुझे गिनाए//

              राजीव रत्नेश
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