खर्च की जबाँ की दौलत ( गजल )
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सब कुछ गँवा के जागे भी तो क्या किया हमने/
छोड़ दिया तेरे लिए ये जमीं, ये आस्मां हमने/
सिकंदर भी जहाँ से गया, खाली हाथ गया,
देखा है लौटते हुए, हर एक कारवाँ हमने/
पिंजरा मिला तो उसमें ही उम्र कटती रही,
आजादियों के ख्वाब मगर कम न किये हमने/
तुमने भी सोचा होगा-- अब क्या करूँगा मैं,
आँखों में दर्द का सैलाब रख लिया हमने/
नजारों से अपने दिल को बहलाया किस तरह,
इक बात पर ही देखें हैं कितने तूफान हमने/
दरिया के बीच कश्ती अगर डूब जाए तो,
किसी ओर जाने से पहले पकड़े पतवार हमने/
तुरबत पे तेरी फूल चढ़ाने भी कौन आता,
रोने को भी न पाया कोई हमनवा हमने/
क्यामतों में जब भी हिसाब माँगा जाएगा,
किससे था तेरा इश्क-- लिया तेरा नाम हमने/
अपनी सफाई में तुम मेरा नाम लोगी क्या?
तुमसे मिलने का फिर भी ढूँढा रास्ता हमने/
ये बंधन यहाँ रहे, तो वहाँ क्या मलाल है,
उड़ने को फिर बना लिया अपना आस्मां हमने/
प्यार की बगिया में फिर फूल खिलाएँगे,
दुनिया के जख्मों को इस तरह भुलाया हमने/
जो कुछ कह न सके थे, यहाँ उम्र भर कभी,
खर्च की वहाँ, जबाँ की दौलत हमने//
राजीव रत्नेश

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