दिल की बात कहने का अंजाम
--- राजीव रत्नेश
फूलों भरी बस्ती में तेरी,
मुझे काँटा चुभ गया,
तुझसे दिल की बात कही और,
मैं तो दरिया में कूद गया/
दिल में जो कुछ छिपा रखा था,
आज तो उससे कह डाला,
सोचा था, वह मुस्कराएगी,
उसने चेहरा लाल किया/
शरमा- शरमा कर खुद भी तो,
लाल- सुर्ख हो गई,
मुझे भी पशेमाँ कर डाला,
जैसे सारी खता मेरी हो गई/
मैंने--'' तुम अच्छी लगती हो ",
वह चुपचाप खड़ी रही,
मेरी धड़कन बढ़ती जाती,
उसकी पलकें झुकी रहीं/
हाले- दिल उसको सुनाया,
मातमी सूरत उसने बनाई,
जैसे मेरी दास्तां सुन कर,
उसकी दुनिया उजड़ गई/
लेकिन उसकी आँखों में,
कुछ और ही कहानी थी,
मेरी तर्ज- ए- बयानी पर,
भीतर ही भीतर मुस्कान थी/
होठों को उसने सी रखा था,
आँखें मगर बोलती थीं,
मेरी सारी प्रेम- कहानी,
चुपके-चुपके तौलती थी/
मैं समझा दिल रख दूँगा,
उसके कदमों के आगे,
वह तब तो बोल पड़ेगी,
या फिर हाथ बढ़ाएगी/
वह तो मेरी हालत देख कर,
और मजे लेती रही,
मैं डूबा था प्रेम-सागर में,
वह किनारे बैठी रही/
अब जब उस दिन को सोचूँ तो,
खुद पर हँसी आती है,
दिल की बात कहने की भी,
कैसी सजा मिल जाती है/
फूलों भरी बस्ती में तेरी,
मुझे काँटा चुभ गया,
तुझसे दिल की बात कही और,
मैं तो दरिया में कूद गया//
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