Monday, September 7, 2026

तुझसे मिल कर तबीयत ( कविता )

तुझसे मिल कर तबीयत  ( कविता )
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तेरा भी उफनता यौवन है, मेरी भी मचलती जवानी है/
तेरी भी एक निशानी मेरे पास है, तेरी भी जिन्दगी एक कहानी है/

समंदर की मौज थी तू, मेरी कश्ती तो साहिल पे आनी है,
एक तरफ तेरा जोर है, जिससे कश्ती मेरी डगमगाती
है/

एक तरफ लहरों का शोर है, उधर एक जजीरे पर बजती शहनाई है,
मुब्तिला था मैं अपनी ही धुन में, उधर हाव- भाव पर 
तू खिलखिलाती है/

रूप मधुर, मनोहर, लावण्यमयी, चरण सुन्दर लटकाए
बैठी पानी में है,
तेरी नयन- मदिरा पीने को उन्मत्त मैं, परम उद्दीप्त हूँ, तेरी अलसित कहानी है/

नथ नाक की डोलाती एक जजीरे से दूसरे पे अपनी कश्ती में जाती है,
आँखों से मदिर- रस के प्याले छलकाते इस पार कभी
आ जाती है/

आ आजा कश्ती अपनी लेकर, तेरे जजीरे पे जाने की ठानी है,
जाल से क्यूँ निहारती मुझको, तुझे मुझ तक आने की
आजादी है/

तेरी दीदार को तरस रहीं आँखें, क्यूँ तू उन्हें बेवजह तरसाती है,
एक बार पास आ चेहरा दिखा, तू मृगनयनी है, मेरी शहजादी है/

अपनी भाव-भंगिमा का जोर चलाती है, कश्ती पुरजोर बहाती है,
.
आँखों में तिरते तेरे नीले बादल, इक बार रोज मेरे साहिल पे आती है/

मेरी कुटिया में बेधड़क आकर, रोटी- मछली मेरे साथ
खाती है,
प्यासी होती है तो, पानी की बोतल खरीद कर ही ले आती है/

कब होगा तेरा भाव- मनोहर- दर्शन, नयनों से तो खूब बात बताती है,
जीवन- बगिया मेरी आकर सुरभित कर ' रतन '
तुझसे मिल तबीयत खुश हो जाती है//

            राजीव रत्नेश इलाहाबादी
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