बीसवीं सदी की तेरी चाहत ( गजल )
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सुब्हो- शाम तेरी याद सताती थी, रात भी मुझे
बख्श नहीं पाती थी/
दिल की बस्ती से निकल, दिमाग पे छाती थी,
मुझे तड़पाती थी/
तेरी जुस्तजू रहती थी हर वक्त मुझे, चमने- दिल
की कली मुर्झाने लगी थी,
एक फूल तेरे जुड़े में सजाने की तमन्ना दिल में
हूक बन कर सर उठाने लगी थी/
तेरी- मेरी मुहब्बत तो जहाँ की सरदर्दी का
बायस बनी हुई थी,
अब तेरा बाप सुकूँ से सो रहा होगा, चैन तो जैसे
उसकी सौत बन हुई थी/
बहेलिए ने तीर मारा, सारस का जोड़ा बिखर कर
जमीं पर सिसक रहा था,
उसे भी यह शायद पता न था, किस लालच से
उसने संधान किया था/
उसकी मर्मान्तक पीड़ा देख कर किसी कवि के
मुँह से उच्चरित हुआ होगा,
" वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा
गान, आँखों से उमड़ बही होगी कविता अन्जान/.
मुहब्बत भी क्या कभी बख्तरबंद गाड़ी में कैद हो
सकती थी,
यह तो सिर्फ सोची-समझी चाल के बदौलत ही
हो सकती थी/
मैंने भी तो उसी ' अभिशप्त सरोवर ' से जल पीने
की ठानी थी,
जिसे पी पाने के पहले ही, पांडवों की जान पे ही
बनआई थी/
अपनी सरजमीं से तेरा नाता तो कभी का, बहुत
पहले ही छूट गया था,
अभी भी तू मेरी चाहत थी, पाकर मेरा प्यार, अपना
सारा दुःख-दर्द भूल गई थी/
एक अनजान सफर की थकान में, पसीने की चुह चुह-
चुआहट तेरे माथे पे थी,
मुझसे ही मिल पाने का हौसला तुमने किया था, पर
खुद को संभाल न पाई थी/
मुहब्बत के आखिरी पड़ाव पे पहुँच कर भी हाय!
तूने फरेब ही खाया था,
कोई नहीं था जहां में तेरा, तेरी हया ही बस तेरा रास्ता
रोक सकती थी/
बीसवीं सदी की तेरी चाहत, इक्कीस में आके किस कदर बदल गई थी,
और ' रतन ' की चाहत भी सिर्फ आँसुओं में ढ़ल कर
दूर कहीं बह गई थी//
राजीव रत्नेश

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