इस बार भी झूला लगाया न होता
--- राजीव रत्नेश
मेरी जिंदगी की कश्ती का जो तू नाखुदा होता/
भँवर में भी मुझे तेरा ही फिर आसरा होता/
तेरे दूर हो जाने का अहसास था मुझको,
तुझे अपना बताता कैसे, जो तू मुझसे खफा होता/
अनजान सफर पे जाना ही था तुझको,
मिल कर मुझसे सफर और तवील न बनाया होता/
जख्म खाए थे तेरी बदौलत कितने हमने,
दूर होकर भी तूने काश! फासला न बढ़ाया होता/
सात फेरों के बंधन में, बाप की मर्जी से बँधी थी,
कैसे तुझे मनाता मैं, कैसे दिल को समझाया होता/
तू अपनी वफा का कैसे अब मुझे सबूत देती,
मेरी भरी महफिल में जो दिल पर न वार किया होता/
तेरी बरबादियों पर भी मैं चुप ही रहा अक्सर,
मेरे किरदार को तूने न यूँ बदनाम किया होता/
जमाना तो चुपचाप सुन रहा था तेरी- मेरी दास्ताँ,
उसे क्या गरज थी जो दरमियाँ हमारे आया होता/
कबसे करता रहा तेरा इंतजार ऐ जिंदगी!
तू और पहले लौट आती तो शायद फिर कुछ बना होता/
सावन आके बीत भी गया तेरे इंतजार में ' रतन, '
इस बार काश! तेरे लिए झूला नलगाया होता//
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