Tuesday, September 8, 2026

इस बार भी झूला लगाया न होता ( गजल )

इस बार भी झूला लगाया न होता
         --- राजीव रत्नेश

मेरी जिंदगी की कश्ती का जो तू नाखुदा होता/
भँवर में भी मुझे तेरा ही फिर आसरा होता/

तेरे दूर हो जाने का अहसास था मुझको,
तुझे अपना बताता कैसे, जो तू मुझसे खफा होता/

अनजान सफर पे जाना ही था तुझको,
मिल कर मुझसे सफर और तवील न बनाया होता/

जख्म खाए थे तेरी बदौलत कितने हमने,
दूर होकर भी तूने काश! फासला न बढ़ाया होता/

सात फेरों के बंधन में, बाप की मर्जी से बँधी थी,
कैसे तुझे मनाता मैं, कैसे दिल को समझाया होता/

तू अपनी वफा का कैसे अब मुझे सबूत देती,
मेरी भरी महफिल में जो दिल पर न वार किया होता/

तेरी बरबादियों पर भी मैं चुप ही रहा अक्सर,
मेरे किरदार को तूने न यूँ बदनाम किया होता/

जमाना तो चुपचाप सुन रहा था तेरी- मेरी दास्ताँ,
उसे क्या गरज थी जो दरमियाँ हमारे आया होता/

कबसे करता रहा तेरा इंतजार ऐ जिंदगी!
तू और पहले लौट आती तो शायद फिर कुछ बना होता/

सावन आके बीत भी गया तेरे इंतजार में ' रतन, '
इस बार काश! तेरे लिए झूला नलगाया होता//

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