तेरे इंतजार की ( गजल )
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कितनी बेकरार गुजरी मेरी पिछली रात भी/
क्यों इतनी तवील सजा तेरे इंतजार की/
चाँद भी बुझा-बुझा रहा सारी रात भर,
क्या थी उसके दिल में वजह तेरे इंतजार की/
नींद आँखों से मेरी रुठती ही चली गई,
दिल को मिलती ही नहीं कोई दवा तेरे इंतजार की/
लोग समझाते रहे, वक्त सब भुलवा देगा,
दिल ने मानी ही नहीं ये बात तेरे इंतजार की/
दर पे आहट हुई तो लगा तु आ गयी,
फिर मिली खामोशियों से ही सदा तेरे इंतजार की/
एक खत भी न आया तेरी ओर से मगर,
रूह करती रही हर पल दुआ तेरे इंतजार की/
उम्र ढ़लती जा रही, मौसम भी बदलते रहे,
कम हो न पाई मगर ये प्यास तेरे इंतजार की/
' रतन ' किस तरह मुला दूँ, मैं तेरी मुहब्बत को,
जिसमें गुजरी है मेरी हर सुबह तेरे इंतजार की/
राजीव रत्नेश

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