रतन बेफिक्र था ( गजल )
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देख कर तेरा उल्लास, ऐ जिन्दगी!
पैरों से लगती न थी जैसे जमीं/
दिल आहत हुआ देख कर खामोशी तेरी,
बाप के सामने भी न खुलती थी जुबाँ/
देखते रहे हमेशा तेरा सयानापन,
फिर भी कली थी तू अभी अधखिली/
रूप तेरा दिखाती थी मुझको यामिनी,
भोर होते ही बिखर जाती थी चाँदनी/
फरेब खाए थे दोनों ने जिन्दगी में,
तेरी- मेरी एक थी दुनिया, एक थी कहानी/
तेरी- मेरी कश्ती जब साहिल पे आ रुकी,
सज्दे में झुक गई सीप, ठहर गई रवि- रश्मि/
पाकर मेरा साथ तू खुश थी बहुत,
वरना अब तक विचरती थी तू अकेली/
कभी स्निग्ध- सुहावन लगती थी तू,
कभी आँखों से चलाती थी तीर जहरबुझे/
सलीका सिखाया तूने मुझे जीने का,
खुद मगर थी अल्हड़, चंचल कामिनी/
मुहब्बत ही एक दिन बैरन बनेगी---
' रतन ' ने बेफिक्र होकर छेड़ दी थी जीवन- रागिनी/
राजीव रत्नेश

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