ट्रेजेडी ( कविता )
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मेरी जिंदगी के साथ हमेशा ये ट्रेजेडी रही,
जिससे प्यार किया, वो दूसरे के साथ भाग गई,
मेहरबां थी वो कि अपने ही खत सारे ले गई,
मेरे आँगन के मुरझाए गुलाब आँचल भर ले गई/
जमाना खिलाफ था मुहब्बत का, तो क्यूँ डर गई,
मुझसे कुछ कहा भी नहीं, और मेरा घर छोड़ गई,
मेरी तकदीर का सिकुड़ा- सिमटा सा यही अफसाना है
खुशियाँ सारी लूट ले गई, नेरे दामन में सारे गम छोड़ गई/
जिन्दा रहते हैं वही गुलाब, जो खाक से जुड़े रहते हैं,
आबो-हवा खिलाफ हो तो वो खुद सहमे- सहमे रहते हैं
मनचलों के लिए तो, खिले गुलाब भी मुर्झा जाते हैं,
याद हमारी वफा की करके, वो होठों में मुस्कराते हैं/
मौका मिला तो जी भर प्यार किया, बंद कर किवाड़,
जमाना उनका था, पर थे तो वो मेरे दिलबर ही,
दस्तक सुन, छटक कर मेरी बाहों से निकल ही गए,
कुछ भी हो, आखिर थे तो वो मेरे हमसफर भी/
लैला ने साथ छोड़ा तो, मजनूं का जनाजा धूम से निकला,
मेरे शहर की सबसे जमाल नाजनी थी, हर कोई उसका निकला,
मैं वफा- पसंद, उसकी हर इक अदा की कद्र करने वाला,
वो तभी तक मेरी थी, जब तक उसे कोई सहारा न मिला/
वो नाजुक कली गुलशन की थी, चेहरे पे बेनाम गमों के साए थे,
दर- हकीकत बात ये थी, कि मुहब्बत तो मैंने भी उसी
से की थी,
उसकी जान कर उसकी राह में फूल' रतन ' ने बिछाए थे,
मेरी रहगुजर में काबिज वो इक मील का पत्थर भी तो
थी//
राजीव रत्नेश
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मसखरी नहीं, दरपर्दा ये हकीकत है अहले- जमाने/
यही तो दर्दे- दिल है मेरा, कोई पहचाने न पहचाने/
राजीव रत्नेश
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" खत भी ले गई, खुशियाँ भी लूटले गई,
वो शहर की नाजनी,
मगर रतन के सीने में छोड़ गई वो शायरी
की अमर रागिनी/"
लबकुशाई जख्म की तो महसूस की हमने,
खुदारा जख्म के रिसाव का सूखना भी देखें/
चंदा ने वक्त का मरहम लगाया भी तो है,
काश! इस नासूर का वक्त से भरना भी देखें/
राजीव रत्नेश
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" अतीत के नासूर को चंदा की वफ़ा ने
सुखा दिया,
रतन के रिसते जख्म पर प्रेम का मरहम
लगा दिया/"
गाफिल नहीं सूझबूझ से उसके,
चंदा का सहारा मिला तो है मुझको/
कितनी यातनाएँ झेली हैं अहले- जमाने,
अब कहीं भरपूर खुशी मिली है मुझको/
राजीव रत्नेश
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" जमाने की हर एक टीस को जिसने
हँस कर भुला दिया,
चंदा की पावन सूझ-बूझ ने रतन को
भरपूर जीना सिखा दिया/"

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