ये किसके खयालों में गुम हो रतन
----- राजीव रत्नेश
तू आया न आया, दिल को तेरा खयाल हो गया/
हम जज्ब करते रहे, फिर भी मलाल हो गया/
आकर भी तू अब क्या करेगा इस महफिल में,
मेरे जीने-मरने का तू ही सवाल हो गया/
जनाजे में जो नहीं आया, तुरबत पे कैसे आएगा,
जमाना भी मुद्दई हुआ, कहर आसमान हो गया/
चंद लफ्ज तूने क्या कहे, तू हमारा हो गया,
आजा, ये घर तेरा है-- तू कब का मेहमान हो गया/
बरसी घटा बन कर, हर तरफ ये चाँदनी,
चाँद भी देखो, किस तरह मेरा हमनवा हो गया/
दिल के दर्द की सूरत बन कर ही अब तो आजा,
देख, मेरा दर्द भी, अब कितना सस्ता हो गया/
दुश्मन समझा था जिसे, दोस्त बन के घर में घुसा,
मेरे जाते ही न जाने उसका कैसा एहसान हो गया/
जोर-शोर उठी सागर की मौज, और तो और,
चूम कर मेरे कदम लौट गई, कैसा ये माजरा हो गया/
तूने तो न की थी कभी कदमबोसी मेरी,
सागर को जैसे आज मेरा ही आसरा हो गया/
ये किसके खयालों में, अभी तक गुम हो ' रतन ',
वो शख्स तो कब का, दुनिया से विदा हो गया//
""""""""""""""""

No comments:
Post a Comment