------ राजीव रत्नेश
तेरा शहर परीलोक का हसीं नजराना लगता है,
हर कोई साकी तो सारा शहर मयखाना लगता है/
हर गली में शाम ढलते ही सज जाती हैं महफिलें,
हर कोई तेरे शहर का इक दीवाना लगता है/
चाँद भी छत से उतर कर रात भर रुकता है यहाँ,
रौशनी का हर दिया इक पैमाना लगता है/
हर नजर में है नशा, हर बात में इक शोखी है,
होश वाला भी यहाँ अब तो बेगाना लगता है/
खुशबुओं के बहाव से, हर राह महकी है यहाँ,
हर हवा का झोंका तेरा अफसाना लगता है/
तेरे दर पे आके हर रिन्द पाता है आशियाँ अपना,
मैकदा भी तेरे आगे मुख्तसर इक वीराना लगता है/
रतन, इस शहर में आ कर भी तू बहका जा रहा,
तू भी अब इस शहर में क्या अनजाना लगता है/
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