राजीव रत्नेश
दिल मेरा आज फिर धड़का था,
लहरों के शोर में
जाने कैसी बेताबी जाग उठी थी,
ऐ नाजनी!
किस्मत का ही कुछ जोर रहा होगा,
मुँह-अँधेरे तू मिली थी मुझे/
मैं समझ न पाया
तू किस गली से निकल कर आई थी/
सर्द कोहरे वाली वह रात
खुद भी कितनी बेचैन थी/
मेरे बदन पर अपना चेस्टर डाल कर
तू जाने किधर चली गई------
और मैं देखता रह गया
तेरे जाने की दिशा/
सारी रात कुछ खुशबुएँ
मेरे आस- पास ठहरी रहीं,
तेरे होने का एहसास बनकर,
मेरी साँसों में उतरती रहीं/
सुबह तक उनकी ऐसी आदत पड़ी
कि उनके बिना
कुछ अधूरा-अधूरा-- सा लगने लगा/
एक मुद्दत से मेरा दिल
कहीं ठहरता ही न था,
कोई मौसम भीतर
अपना रंग भरता ही न था/
तुझे देखा तो लगा,
मेरे दिल के सूने चमन में
अचानक बरसात हो गई/
मैंने सोचा------
क्या यही वह मुहब्बत है
जिसे दुनिया बुरा कहती है?
अगर यही है,
तो तुझे शिकायत कैसी-----
तेरे मिलने से ही
मुबारक मेरी शाम हो गई/
मैंने तुझसे कहा,
अब इतने नखरे भी क्या,
जरा मेरे करीब भी आ!
तुझसे जाने कबसे
मेरी पहचान हो गई है/
तुमने घूंघट उठा कर
मेरे सामने आना तो स्वीकार किया,
मगर तेरी झुकी नजरों ने
कितने सवाल अनसुलझे छोड़ दिए/
जमाने का डर था
या दिल की कोई मजबूरी------
मैं अब तक समझ नहीं पाया/
तेरे साथ का अफसाना,
मुकम्मल भी हो सकता था/
मगर तू प्यार में आगे बढ़ आने की
हिम्मत न जुटा पाई,
और मुझे एक अंतहीन सफर पर
जाने को मजबूर किया/
मगर तेरे जाने के बाद भी,
याद तू बेतरह आई,
और मुझे लिखने को,
यह विरह- गीत मिल गया/
अब जब कभी रात उतरती है,
और लहरों का शोर सुनाई देता है,
मैं उस गुजरी हुई मुलाकात को,
फिर अपने अंदर ही महसूस करता हूँ/
दिल मेरा आज भी धड़कता है-----
शायद उस रात के नाम से,
जो गुजरते- गुजरते गुजरी,
मगर मेरे भीतर
आज तक गजल गाती है/
( एक रहस्यमयी मुलाकात और उसकी
शेष रह गई खुशबू के नाम )
राजीव रत्नेश
""""""""""""""""""""""

No comments:
Post a Comment