------ राजीव रत्नेश
मुहब्बत दरियादिली का नाम है,
कंजूस दिल वाले मात खा जाते हैं/
मुहब्बत सबकी सरपरस्त होती है,
जो न समझें घात खा जाते हैं/
जो वफा को तौलते रहते हैं, हर बात में,
वो ही अपनी सारी सौगात खा जाते हैं/
इश्क में सूद- ओ- जियाँ गिनते रहे ताउम्र,
वो खुद अपनी बिछाई बिसात खा जाते हैं/
जो रखते हैं दिल को बड़ी हिफाजत से,
वो ही दिल के सारे जज्बात खा जाते हैं/
अना की ऊँची दीवारें, जिनके दरमियाँ उठीं,
वो मिलन की हर मुलाकात खा जाते हैं/
जो वफा के पानी से रिश्ते नहीं सींचते,
सूख कर वो अपनी हयात खा जाते हैं/
रतन, दिल को कर समंदर, बाँट दे सारा प्यार,
सूखते दरिया तो अपनी जात खा जाते हैं/
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