----- राजीव रत्नेश
बस्ती में आज फिर कोई सपेरा आया है,
चाँदनी कुंडली मारे बैठी है, दिल पर कैसा साया है/
बीन की धुन पर थिरकते हैं सब ख्वाब मेरे,
नींद पर किसने कोई मंतर पढ़ाया है/
जिस्म बैठा रह गया, रूह मगर उठ कर चली,
कौन है जिसने मुझे अपना बनाया है/
साँप जैसी रात लिपटी है मेरी तन्हाइयों से,
जहर भी इस बार कुछ मीठा-- सा पाया है/
लोग कहते हैं, उतरेगा नशा सूरज के साथ,
मैंने हर सूरज को पहले ही सुलाया है/
सब दवाएँ, सब दुआएँ, सब हकीम आजमा लिए,
दर्द ने हर बार मुझको और गहराया है/
रतन, उसकी बीन का जादू उतरता ही नहीं,
खुद ही मैंने साँप को दिल में बसाया है/
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