दो बोल बोल दे साकी ( कविता)
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दिल आज बहुत उदास है मेरी साकी!
तेरी महफिल में आज आखिरी रात है साकी!
तेरी बज्म छोड़ कल मुझे जाना होगा,
आज तो लबों से दो प्यार के बोल बोल साकी!
अब जाने किधर होगी अपनी राह साकी!
न मंजिल का पता है, न कोई ठिकाना साकी!
आज आखिरी बार जामे- नजर पिला तो दे,
अपनी किस्मत में कोई कल का भरोसा नहीं/
किसी और मयखाने में वो लज्जत नहीं साकी!
जो चढ़ा सकूँ तेरी आगोश में सर रख के ही/
अब न वो पहलू मिलेगा, न फिर मरमरी बाहें,
आज तो लबों से प्यार के दो बोल बोल साकी!
तेरे मयखाने में रिन्द हैं बड़े- बड़े,
पर उनको भी मुफ्त यहाँ कभी मिलती नहीं/
मैं सिलसिलेवार पीता था, रखता था हिसाब नहीं,
दिल कहे तो लबों से प्यार के दो बोल बोल साकी!
गिरफ्तारे- मुहब्बत हूँ तेरा, महफिल भी तेरी,
हम सुखनवर तेरे, मजलिस भी तेरी/
नजर से ही पैमाना तक पी जाते हैं,
तुझे तो मालूम है हकीकत मेरी/
नजरें मेरी पाबन्द हैं, तेरे नजारे से भी,
आजा ढ़लती रात में ही, इशारे पे ही सही/
दिल अता किया था, जां भी कुर्बान कर देंगे,
दिल कहे तो लबों से प्यार के दो बोल बोल साकी!
मेरे जाने की खबर से तू क्यूँ उदास है साकी!
दिलबर और तुझे मिल जाएँगे, मैकदा न होगा खाली/
आज मेरे लबों की लाली, अपने लबों पे समेट ले,
कल और कौन होगा, जो करेगा तुझसे मुहब्बत साकी
देख अब तू और किनारा मुझ से न कर,
मैं ही निकालूँगा तुझे सुरूर के दरिया से/
अपना फसाना तुझी से तरन्नुम में सुनूँगा,
एक बार प्यार से दो बोल गुनगुना दे साकी!
जिधर तेरी जुल्फों की छाँव न होगी,
उधर ही अब मेरी राह होगी साकी!
चलना होगा काँटों भरी डगर पर,
मंजिल भी कोई मेरे पास न होगी/
जमाना तो मुद्दई- ए- मुहब्बत सदा रहा है,
यही सोच तुझसे अब जुदा हो रहा हूँ/
महफिल मेरे सिवा ही करना आबाद,
चलते-चलते प्यार के दो बोल बोल दे साकी!
राजीव रत्नेश
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