एक अदद नाक की तलाश में ( गजल)
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निकल पड़ा हूँ एक अदद नाक की तलाश में,
अपनी मुख्तसर सी अदद नाक के सहारे/
कहीं तो होगी मुलाकात, कहीं किसी राह में,
कहीं तो मिलेगी वो नाक किसी किनारे/
सफर तवील सही, बस मुझे तो एक ही आरजू है,
होगी मुलाकात नाक की नाक के ही सहारे/
आवाज दे के भले न वो बुला सके मुझे,
एक हल्की छींक से दिखा जाए मुझे रास्ते/
देखा था जिस दिन पहले - पहल उस नाक को,
आगे की कहानी बढ़ी तो उसी नाक के सहारे/
नाक ने नाक की बात नाक से कही,
कैसे होगी अगली मुलाकात, हो गए इशारे/
नाक उनकी बन जाती कभी जजीरा, कभी समंदर,
हम हौले-हौले अपनी कश्ती ले आए किनारे/
देखा जो मुझे बुलवा भेजा नाक के सहारे,
तजवीज से मिले थे, हम तकदीर के मारे/
सूर्पणखा की नाक भी कोई गई- गुजरी न थी,
बेवजह वार खा गई, रंजिश के मारे/
हमको तो अच्छी लगती उनकी नाक हर हाल,
खुशबू लेती चलती है जो चमन- चमन, बाग- बाग/
उन्होंने दिल का हाल नाक से कहा, नाक ने मुझसे,
नाक ने नाक का मारा, जब उसके बदले इरादे/
मुहब्बत की नकहतें समेटने को नाक बुनियाद है,
गंगो- जमन की कसम, फुर्कत में याद उसकी नाक है/
नाक की नाक से हुई मुलाकात, देखो सहर हो गई,
वो जाग गए, फिर से बदले अपने जमाने/
सहन में नाक ने छिड़काव जो कर दिया,
फिर से उड़ाने लगे खलिल मियाँ अपने फा ख्ते/
ऐ हसीनों अपनी सलोनी नाक संभालना,
कब से जाने हो तुम सी० सी० टी० वी० के सामने/
क्या दिन दिखाए' रतन' को लोगों ने नाक के वास्ते,
हम भी भूले-बिसरे पहुँचते रहे, ढूँढ़ मिलन के रास्ते//
राजीव रत्नेश
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