यही तो बस कमजोरी है ( कविता)
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ले दे के यही तो बस कमजोरी है/
औरत खुद ही बड़ी बीमारी है/
एक तो मेरे शेरो- सुखन की चोरी,
ऊपर से पूरी सीनाजोरी है/
कभी की थी डाकेजनी मेरे घर,
उसकी याद आजकल टीस दे जाती है/
और कुछ भले वो चाहे न चाहे,
पर यादों के अक्स चुरा अलग हो जाती है/
मेरी एक- एक गजल के लिए,
कितनों से कितनी मारामारी है/
दिल पर छाया यास का नक्शा,
याददाश्त भी मेरी मारी जाती है/
चमन के बूटे- बूटे गुनगुनाते उसकी गजल,
हर गुल में थिरकन है, उसकी याद सुहानी है/
कभी तो उसकी पाजेब रुनझुनाती है,
वो कुछ और नहीं, मेरी अनकही कहानी है/
मगरुरे- फन उसका देखा, हातिम की दादागीरी है,
बात-बात पर लुटाती मोहर, थैली होती न खाली है/
दिलफरेब मंजर उसी का समझते रहे,
अब पता लगा वो शैतान की नानी है/
बदन उसका गुलबदन की नौबत बाजे,
पलकों पे ख्वाब सुनहरे, आँख नशीली है/
गाजे-बाजे की धूम में, ये भी भूल गई,
कब की हो चुकी उसकी माँग सिन्दूरी है/
हम खुद उससे नाता तोड़ नहीं सकते,
यही तो अपने दिल की मजबूरी है/
हम लाख चाहें, भूल जाना दुनियादारी,
पर वह भी नंबर एक की हठीली है/
चुराना आँख का काजल चाहें,
सामने आने में भी कतराती है/
ले दे के यही तो बस कमजोरी है,
औरत खुद में एक बड़ी बीमारी है//
राजीव रत्नेश
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