सइय्याँ से भइय्या तक का सफर ( कविता )
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दिल तोड़ने का तुमसे गिला नहीं है/
राखी मुझको भेजा, शिकवा यही है/
मेरी गुस्ताख निगाही पर ब्रेक लगाया,
या साल में दो बार मिलने का मन बनाया/
मुझे ये कैसा तुमने शिफा दिया,
खुल्लम खुल्ला मिलने की रजा दिया/
तुम्हारे पास दिल नहीं पर भेजा तो है,
राखी का लिफाफा मुझे भेजा तो है/
तुमको आना हो तो , जब चाहे आओ,
मैं ही क्यूँ मिलूँ, कुछ तो अक्ल लगाओ/
यूँ तो चोरी-चोरी भी मिल लेते थे,
एक दूसरे की आँखों में झांक लेते थे/
इन बातों की तुमने खुली मुनादी कर दी,
मेरी जेब से जबरन पैसा उगाही कर दी/
निकम्मे थे तो ही हम भले थे,
कमाने लगे हैं, ये बात तुम्हें पता थी/
तुम्हें अपना जान कर ही दोस्ती की थी,
तुमने सारी दोस्ती की ऐसी-तैसी कर दी/
अब तुम्हारी राह तकना भी छूट गया,
जिस राह आओगी, वो रास्ता भी दूर गया/
' रतन ' को सइय्याँ से भइय्या बना गई,
दूर जाके भी मुझे अपना बना गई//
राजीव रत्नेश
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" जिसके लिए छत पर खड़े रहे,
वो राखी का लिफाफा पकड़ा गई/
रतन चला था सइयाँ बनने,
वो उम्र भर का भइया बना गई// "
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