मेरे अँगने में तुम्हारा क्या काम है ( कविता )
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जबसे मेरे घर में हुआ पहली बार पदार्पण तुम्हारा,
मुझे याद आया ' मेरे अँगने में तुम्हारा क्या काम है '/
आँगन तो था नहीं, छत पे ले जा तुम्हें नचाया,
गली के मनचलों ने हूँटिंग कर दी, तुम्हें नीचे बुलाया/
जिसकी बीबी मोटी उसका भी बड़ा नाम है,
एक किक लगा दो, फुटबाल का क्या काम है/
जबसे तुम आईं, मुहल्ले में ' गोरिल्ला- युद्ध ' शुरू हुआ,
दो को पकड़ के ' शांति- भंग ' में उनको बंद कराया/
जिसकी बीबी पतली, उसका भी बड़ा नाम है,
खूँटी से लटका दो, हैंगर का क्या काम है/
तुमने दी थी मुझको एक छल्ला अपनी निशानी,
मैं क्या जानूँ, तुम छत पे खड़ी, गली में दिलबर जानी/
जिसकी बीबी लंबे केशों वाली, उसका भी बड़ा नाम है,
पकड़ कर हाथ-पाँव बाँध दो, रस्सी का क्या काम है /
मैं महबूब तेरा, तेरे नाम- रूप का दीवाना,
मैं खड़ा छत पे, बगल की छत से कोई कुदा/
जिसकी बीबी की आँखें झील, उसका भी बड़ा नाम है,
डुबकी लगा लो, जमुना का क्या काम है/
सुनी-अनसुनी बातों से ही दिल को सहारा हो गया,
तूफान आया न आया, नसीब मुझे किनारा हो गया/
जिसकी बीबी चाँद जैसी, उसका भी बड़ा नाम है,
अमावस की रात छत पे सुला दो, चाँदनी का क्या काम है/
राजीव रत्नेश
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