Monday, March 2, 2026

शमां और परवाना

शमां औ' परवाना  ( कविता)
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एक शमां जलती है महफिल में,
हजारों परवाने कहीं से पहुँच जाते है/
तपिश- ए- बदन की परवा नहीं करते,
चिकनी काया पे शमां की फिसल जाते हैं/

उनके आने के पहले ही पैग़ाम- ए- मुहब्बत,
उनके अधरों के मुस्कराहट बन जाते हैं/
वो कुछ समझें न समझें, हम जानते हैं,
ये वो परवाने हैं, जो बिना शमां ही जल जाते है/

मिटने के पहले कहाँ तस्कीने- वफा होती है,
जलने औ' जलाने के बाद कहीं राज खुलते हैं/
शमां तो होती बेवफा, किसी को नहीं बरसती,
निशाने के पहले कितने उसकी आगोश में आ जाते हैं/

वो मोहतरिम भी है, कमसिन भी किसी से कम नहीं,
उसकी एक झलक पाने को परवाने ललच जाते हैं/
हम महफिल उठा देते हैं, शमां पहले ही बुझा देते हैं,
पसंद नहीं हमें खून- खच्चर, परवाने खुद सिमट जाते हैं/

मेरी नजरों में शमां तो होती है बेवफा,
उसकी मुहब्बत में दोस्त दुश्मन बन जाते हैं/
कोई नहीं समझता फिर भी हकीकत- ए- इश्क,
आसानी से नजाकत हुस्न की हम समझ जाते हैं/

मरसिया- ख्वानी कौन करेगा उनकी,
हिफाजते- जान समझ कर उनकी/
गैर तो गैर, शमां भी करती बेवफाई,
अनजान हो, हम भी सू- ए- मकतल चल देते हैं/

शमां तो दिखाती अपने जौहरे- हुस्न,
दिल वालों के लिए हो जाती आजार जिस्त/
हम पाँखों को गिन आधा करके गिनते लाश,
और मरघट के मंडलेश्वर को सौंप देते हैं/

महफिल के बंद हो जाते हैं जब किवाड़,
थोड़ा सुकूने- दिल होता है, जां में जां आती है/
मुहब्बत के दस्तुर को निभाना जानते हैं,
पर जान-बूझ कर जान देने से गुरेज कर जाते हैं/

मासूमियत तो जरा शमां की हम देखते हैं,
करके हजारों कत्ल बिलकुल खामोश है/
कहती खुद आए परवाने, हमने तो बुलाया नहीं,
दिल लगाने के अंजाम से क्या वो होते बेखबर हैं?

माना मुहब्बत बरबाद करती है,
पर यहाँ परवाह कौन करता है/
हम भी मर-मिटे अपनी महबूब शमां पे,
' रतन' को इंतजार खटकता है, जब वो खुद नहीं आते हैं/


                   राजीव रत्नेश
         ट्विन टावर, ग्रेटर नोयडा, यू० पी०/
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