तुम्हारे जन्मदिन का जश्न ( कविता)
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मुट्ठीगंज की गलियों से, जो उठी एक आवाज है,
वही सुरमई लहर, आज मेरा सबसे बड़ा साज है/
वैसे तो हर लम्हा, हर दिन, बस तुम्हारे नाम है,
पर" फरवरी" की यह चौदह तारीख बड़ी खास है/
नजर की दुआ है, लबों की ये सौगात है,
तुम पूजा हो मेरी इबादत की, मेरा अरमान हो/
तुम्हारे होने से ही, मेरी शायरी की बिसात है,
इस जर्जर कश्ती की, तुम ही तो पतवार हो/
14 फरवरी 1983 की सुबह की पहली रश्मि के साथ
इलाहाबाद के सरकारी डफरिन अस्पताल में प्रगटी नवजात/
बाबा सबेरे-सबेरे अपनी क्यारी का ले के आए गुलाब,
जिसने सबसे पहले बताया, साला बड़ा था, लड़के- लड़की की नहीं पहचान/
फिर भी जिन्दगी के इस छोर तक तुम्हें लड़का ही जाना/
आर्य कन्या स्कूल में पढ़ी, ग्रेजुएशन में टाप कर जाना/
सभी कुछ तो अदभुत लगता है, खुशियों की बेला थी,
दादा-दादी का साथ था, साथ था तुम्हारा अनजाना/
प्रेप में तुम्हें साथ ले के तुम्हारे स्कूल जाना,
बड़ी मुश्किल से जाती थी, मेरे गाल पे दाँत तुम्हारा गड़ा देना/
कभी न मारा, न कभी डाँटा तुमको या किसी बच्चे को,
पाकेट खर्च से खर्च भी करती थी, तो मम्मी से पूछ लेना/
आफिस जाने के पहले तुम्हें एक कचौड़ी दमालू के साथ,
डान्स सीखने जाती तो दो लड्डू बेसन वाले शाम को छुट्टी के बाद/
कुछ बड़ी हुई बाबा- दादी, पापा-मम्मी के अरमानों के
साथ,
ताइकवान्डो में' ब्लैक- बेल्ट' होकर कराया तुमने नाम/
जिस क्षेत्र में कदम रखा, सफलता तुमने पाई है,
एल०टी० में इलाहाबाद डिवीजन टाप किया/
एम० ए०( हिन्दी) में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से फार्म भरा,
कुछ नंबरों से तुम्हारा फर्स्ट डिवीजन आने से रुका/
फिर भी तुमने हार न मानी पढ़ाई के साथ ही,
सिटी चैनल में समाचार और रिपोर्टिंग करती रही/
अपनी पढ़ाई का खर्च खुद वहन किया,
किसी से कुछ न चाहा, अपने पैरों पर हमेशा खड़ी रही
हर कम्पेटेटिव इम्तहान देने मेरे साथ जाती थी,
लौट खुद तुम शाम को घर आ जाती थी/
पी ० सी० एस ० का इंटरव्यू दो - दो बार दिया,
एस० एस ० सी० के इम्तहान में अपने बैच में टाप कर दी/
सर्विस ज्वाइन करने पर पहले घर में कार आई,
जो सम्हौरी भाई- बहनों की जलन का कारण बनी/
मेरे सात भाइयों की औलादों में एक तुम्हीं हो,
गवर्नमेन्ट सर्विस में भी शान से रहने का आगाज कर गई/
तनू को जे० आर० एफ० का इस्तहान दिलाने को,
उसके साथ यूनिवर्सिटी गई, खुद भी इम्तहान दे आई/
तुम पहले अटेम्ट में इम्तहान कलीअर कर आई,
तनू दूसरे अटेम्ट में ही जे० आर० एफ० फाइनल कर पाई/
शादी के रिश्ते तमाम आए, पी ० सी० एस ० कवालीफाइड तक के,
पर तुम्हें रिश्ता कोई पसंद न आया/
धुन थी अपनी शादी खुद करने की,
लव-मैरिज करना ही तुम्हें भाया/
मैं बचपन से कहता रहा हूँ, आर्य- समाज मेरी पसंद है,
वह जाति धर्म नहीं देखता है, उसमें किसकी का सरनेम नहीं होता है/
प्राचीन ग्रंथों से पता लगता है, हम आर्यों की संतान हैं,
वेद हमारा धर्म है,
महाभारत में पत्नी का पति को आर्य कहना कितना
मधुर और सुखद लगता है/
वह शादी का सर्टिफिकेट भी देता है,
और पूरी तरह से दहेज के खिलाफ है,
शादी में वेद- मंत्रों का उद्घोष होता है,
जो शादी की मुनादी करता है/
सनातनी रीति से तुम्हारी शादी संपन्न हुई,
मेरे आर्य- समाजी पन को किसी ने मान्यता न दी/
मैंने तुम्हारे छोटे मामा के सामने कह दिया, कि
मेरा कुछ नहीं लगा, तो वह बोले, दामाद को कटोरा
दिया था/
रिंग- सेरेमनी में उसने हल्ला मचा दिया था,
यहीं पर लगा कि शादी में उसको बुलाना गल्ती थी/
जबकि पाँच सौ बराती आए थे, घराती दो सौ थे,
सबसे ज्यादा चिढ़ उसको इस शादी की थी/
तुम प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में रही,
मनीष हमेशा इलेक्ट्रानिक मीडिया में रिपोर्टर रहा/
सबसे ज्यादा चिढ़ सालों को मुझी से थी,
अपने दामादों को शगुन का भी कटोरा न दिया होगा/
( इसीलिए किसी को बुलाया नहीं, गुपचुप लड़की की
पाताल- लोक में शादी कर दी)
शमशान- घाट के कफनखसोट महाबाम्हन को,
शादी की शिरकत में बड़ी खामी नजर आई/
मम्मी-पापा और भाई- बहन के पास तीन घंटे में पहुंचोगी,
तुम अपना ट्रान्सफर ले के आगरा आई/
हर साल आज तक मनाता रहा यह त्यौहार,
मिलते रहें तुम्हें " वैलेन्टाइन-डे" पर नाना उपहार/
सूरज की तरह उठो क्षितिज से,
फैला कर उजाला कर दो, तिमिर का नाश/
खिलती रहे ये मुस्कान, जैसे चमन में कली,
जन्मदिन की मुबारकबाद, मेरी रूह की दुआओं के साथ/
तुम सलामत रहो और सलामत रहे तुम्हारी गली,
' रतन' की कलम लिखती रहेगी, उम्र भर तुम्हारा साथ//
राजीव खत्नेश
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