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साकिया! आज मेरा एक कर दे,
अपनी नजर मेरे दिल के पार कर दे/
बहुतों का आज गुनहगार हूँ मैं,
दिले- मासूम को आज तू चाक कर दे/
कभी मोहब्बत की तलाश थी मुझे,
अब इक वफा की बची तलाश है/
एक जाम नहीं काफी साकी मेरे,
दिल में एक अनबुझी प्यास है/
आज कुछ इतना मगरूर हूँ मैं,
चाहे तो तू मुझे नजरों से मार दे/
साकिया! आज मेरा एक काम कर दे,
अपनी नजर मेरे दिल के पार कर दे/
किसी ने हाथ भी थामा था हालाते- गर्दिश में,
वो भी दो रोज के मेहमान बन के आए थे/
आँखों से उनकी झलकती थी वफा,
फरेबों के पर दिल में उनके घुमड़ते साएथे/
मुझे मिसाल न दे हीर और राँझे की,
बस आज तू मेरी जिन्दगी तमाम कर दे/
साकिया! आज मेरा एक काम कर दे,
अपनी नजर मेरे दिल के पार कर दे//
राजीव रत्नेश
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