Monday, March 2, 2026

खेल- खेल में

 खेल- खेल में  ( कविता)
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छोटे- छोटे बच्चे इतना रोते क्यूँ हैं?
मम्मी-पापा आफिस जाते हैं तो,
आसमान सिर पर उठाते क्यूँ हैं?
हलक में प्राण अपने अटकाते क्यूँ हैं?

इतनी सामर्थ्य उनमें आ कैसे जाती है?
कि मम्मी-पापा भारी कदमों आफिस जाते हैं,
दादी-दादा, नानी- नाना में सबल औरतें हैं,
उन्हें न तो ब्ल्ड-प्रेशर है, न ही हार्ट की बीमारी है/

नाना- बाबा अक्सर दिल के मरीज ही होते हैं,
जवानी में बीबी नकेल डाल नचवाती है,
बुढ़ापे में शक अपने खसम पे करती हैं,
और उनको पैरों में बेड़ी डाल के रखती हैं/

मुझे भी तो बच्चों का रोना अखरता है,
उनके लिए टाफी लाना नहीं अच्छा लगता है,
पर बच्चे तो बच्चे ही होते हैं, मानते नहीं,
सबको नाच नचाते, चिल्लाना अच्छा लगता है/

नातिन मेरी चार साला, गले में जोर ज्यादा है,
नहीं मानती किसी की, उससे घर में शोर ज्यादा है,
उसे लेकर पार्क में, मैं कैसे जा सकता हूँ?
मैं भी प्रदूषित हवा में साँस कैसे ले सकता हूँ?

चलने में दिक्कत भी मुझे अब रहने लगी है,
सुब्ह- शाम जोड़ों में दर्द रहता कुछ ज्यादा है,
अटक जाती है साँस मेरी, जरा-जरा सी बात से,
घर में बीबी का जुल्म रहता कुछ ज्यादा है/

अपने शहर में तैनाती स्थल पर टाइम-पास,
करने को, चाय की दुकानों पर,
सिविल- लाइन्स की सड़कों पर,
दोस्तों के साथ टाइम कट जाता था/

फिर घर आकर फिर उसी माहौल में,
अपना बन्दोबस्त करना ही पड़ता था,
मुहल्ले- टोले में बच्चे भी थे, खेलते थे,
बड़े- बच्चे गलियों में अक्सर शोर मचाते थे/

अपने घर में वो अपने को बड़ा मानते,
बूढ़े-बुजुर्गों को घर का नौकर समझते थे,
मान-मनौवल बच्चों की नहीं कर पाते हैं
बुजुर्ग आदत से लाचार, व्यवहार न समझते हैं/

जानते हैं बुढ़ापा खुद ही एक बीमारी है,
इस उमर में कोई न कोई दवाई जरूरी है,
हर चीज पर मार पड़ी मँहगाई की है,
उन चीजों के दाम बढ़ गए, जिनका शौक जरूरी है/

हर मुहल्ले में एक मंथरा होती है,
पूरे टोले का संचालन उसके हाथ होता है,
दिल्ली से दौलताबाद, दौलताबाद से दिल्ली,
तक वह अपना धावा मारा करती है/

अपनी लहर बहाती हर घर में,' मौसी' कहलाती,
किसी की लगी- लगाई शादी रुकवा देती है,
अच्छे-भले, बड़े होटल का इंतजाम रहता है,
पर वह गली के मंदिर में सब निपटवा देती है/

एक तो परेशान मैं अपनी नातिन से,
दूसरे रहता हूँ हैरान मन्थरा डायन से,
कितने घर उजाड़े, खुद का बसा नहीं पाई,
सबके घर में गुल- गपाड़ा मचवा देती है/

हैरान हूँ इस बुजुर्गियत से अपनी भी,
कैसे करूँ मदावा बीबी की अपनी ही,
संत्रस्त रहता हूँ उसके नाम से ही,
वह भी मुझे छोड़, कहीं नहीं जाती है//
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अपनों को छोड़ कर,
          परायों पर भरोसा रखने वाले/
कट जाते हैं जैसे बकरे,
          अम्मा के खैर मनाते- मनाते//

           राजीव रत्नेश
ट्विन टावर, ग्रेटर नोयडा, दिल्ली/
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