सारे चमनो- गुलिस्तां तुझ पर कुर्बान ( गजल)
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अगर तेरे प्यार का मुझे सहारा न होता/
इस जहां में फिर मेरा गुजारा न होता/
गुझिया- पापड़ खिलाती हो अपने हाथ से ही,
कहती हो थाल ये किसी हाल तुम्हारा न होगा/
धौल-धप्पा खुद ही करती हो, ठहराती हो मेरी खता,
और कहती हो ये दिल कभी तुम्हारा न होगा/
सफाई के नाम पर बर्तन चमकवाओगी मुझसे,
घर में तुम्हारे हाल ये हर्गिज हमारा न होगा/
कहती हो भैंस पानी ज्यादा पी गई होगी,
एक दिन भैंस पानी ही देगी, दूध का नजारा न होगा/
मुब्तिला जाने क्यूँ हो गए थे इश्क में तुम्हारे,
तुम हमें समझ न सके, मूक अब तुम्हारा इशारा न होगा/
मिठाइयाँ बनाता हलवाई, खाँड़ फेटफाट कर,
जबां जिस गई, काश! नमकीन भी बनाया न होता/
चले आए समंदर की जानिब, तुमको सदा देते हुए,
न आते, होने को जो मेरी कश्ती पे सवार इरादा न होता
मस्तूल पर लटका देता ढेरों कमल, तुम्हारे कहने से,
भले कोई भारतीय जनता पार्टी का समझा न होगा/
तहरीर- ए- मुहब्बत का इकरारनामा तो तुम्हीं ते था,
काश! मेरा साथ तुम्हें हुआ गँवारा न होता/
फिर फूल खिलने लगे हैं गुल्शन- दर- गुल्शन,
इक बार पलट के देखो, हासिल फिर ये नजारा न होगा
रातरानी की खुशबू तो रात को ही मजा देती है,
काश! रात की उम्मीदों का कोई सवेरा न होता/
तेरे लिए फूलों का गुलदस्ता बना कर ले आए हैं,
तुमसे कोई और मुझे ज्यादा प्यारा न होगा/
बागबां सोकर जाग उठा है, बागबंदी हट गई है,
तेरी जुल्फों के बादल घुमड़ उठे, काश! वीरान गुलसितां न होता/
सुब्ह भी शिकवा, शाम का भी करना गिला तुम्हारा,
मैं न देता तुम्हारा साथ, तुमसे जुड़ा जो मेरा फसाना न
होता/
दिलो- जां हारे ही थे तुम्हारी आरजू में हम तो,
काश! दिल हमारा बना तुम्हारा निशाना न होता/
सारे चमनो- गुलिस्तां तुझ पर कुर्बान" रतन",
कुछ वो दूँ, जो किसी ने किसी को दिया नजराना न होगा/
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अगर प्यार की चाहिए मेहरबानी,
न कर पूजा- पाठ में कोताही/
कृपा चाहिए तुझे किसी की,
तो भज ले भोले- औघड़दानी//
राजीव रत्नेश
ट्विन टावर, ग्रेटर नोयडा,
दिल्ली
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(कृपया आप इसे मेरी दूसरी प्रोफाइल, जा आपने
बनाई है, इस रचना को उसी में स्थान दें)
राजीव रत्नेश

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