छलकती मय पर मेरा भी हक है ( कविता)
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मैंने की है मुहब्बत तुमसे, नजरे- इकरार का मुस्तहक हूँ,
तेरी आँखों की छलकती मय पर, आखिर मेरा भी हक है/
वक्ते- माजी का सिलसिला, जेहन पर उभर आता है,
हम तुम्हें बताएँ क्या, क्या समझ में मेरे आता है,
पुरुषोत्तम की दुकान पे रोज जाती मुहल्ले की मौसी,
सुबह देशी घी की कचौड़ी, और लब पे पुरुषोत्तम का पान है
सुबह से शाम तक हमारे कई- कई दौरे- शराब हो गए,
हमारी तो बस तेरे जामे- लब पे ही बस टिकी नजर है/
हम तुझे नजरे- खास पर गुलाब सा सदा रखते हैं,
आजारे- जीस्त है मगर हम मखमली लिहाफ समझते हैं/
मेरी सरफरोशी का गवाह इक तुम्हीं बन जाना,
तेरी महफिल का मिजाज कुछ- कुछ हम समझते हैं/
फुर्कत में बस तेरी याद है, दिल में घुटी - घुटी सी आह है
तेरी चाहत का दीवाना हर बसर, दुआ देने को बेताब हर दरवेश है/
तेरी दर का मैं एक खाकसार, बस तेरा मुलाजिम ही सही,
उनींदी आँखों में, जानता हूँ, है सिर्फ तेरा सपना ही सही,
हर कोई तुम्हारा है, नजरें उठा कर देखो तो इक बार सही,
कुदरत का भूल जाओ करिश्मा, आईने में खुद को देखो तो सही/
सब तुझे हुस्न की मलिका ही जानें और समझे हैं,
इक हमारी ही तेरी अदा- ओ- नजाकत पे नजर है/
जिस जगह अमृत कलश छलका तीर्थ बन गया,
प्रयाग, नासिक, उज्जैन और हरिद्वार बन गया,
सात समंदर पार तेरे साथ जाने की सोची ही थी,
कि रास्ते में हमारे, गंगा- सागर पड़ गया/
तुम्हारे बिना तीर्थ दर्शन न किया, कुछ तुमको खबर है,
तुम पर मेरी बात का क्या थोड़ा बहुत भी असर है/
गुलजार रहता रंगीनियों का मेला, भक्तों की ठेली- ठाला,
तुझ बिन किसी से कौन करे व्यर्थ का झंझट- ओ- झमेला,
हम तो बस तेरा नाम लेकर ही लंबे सफर पे निकले,
आ मिलो बीच राह के छोड़ कर ये तेरा वो मेरा/
किसी से तेरा कोई सानी नहीं, न ही जमाने की फिकर है,
दिल के दरवाजे पर बैठा तेरे इश्क का कोई बीमार है/
गुजरता गया तब्बसुरे- माजी, तेरे ख्यालात से हैरान हो कर,
हम तुझे अपनी बनाने को डोरे डालते थे पशेमानी में आसमान पर,
पीरे- मुगां ने कुछ न सुना, लिखा दिया मयखाने की दीवार पे,
कमजर्फ को शराब देना अब तो बेशक हराम है/
रिन्द को न हो तो न सही, पर मुझे तो हैरानी- ओ- गैरत है,
कौन जाएगा उसकी दुकान पे अब पीने-पिलाने, मुझे तो हैरत है/
हुस्न कायनात है, तो इश्क भी उसका गिर्दाब है,
हमको हमेशा तुझी से मतलब, यह मेरी आदात है,
मनचले राह में तेरे मुझे पत्थर मारें भी तो क्या,
हम तो मुसलसल लेते बस तेरा ही नाम रहे/
कली चटकेगी कोई, तभी तो भ्रमर चमन से नाता जोड़ेगा,
तू क्यूँ जश्ने- बहारां!, कदमों में मेरे तू बिछी- बिछी नजर आए/
दूरी हद से बढ़ी जाती है तेरे-मेरे बीच खलवत में,
किस अफसाने को सराहूँ, किससे दूर रहूँ मन्नत में,
सब कुछ लुटा के होश में आए तो सोचा तो यही सोचा,
चल के कुछ रोज गुजारें हजरते- वाइज की सोहबत में
दिल की बला आखिर हम तो सड़क पे लाए,
बसर वही है, अखबार में जिसकी खबर आए//
राजीव रत्नेश
ट्विन टावर, ग्रेटर नोयडा, यू० पी०/

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