उनकी फसल पे क्या तुम्हारी?
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इश्क करने की गालिबन मनाही भी नहीं है/
इश्क तजरबाते- जिन्दगानी भी नहीं है/
कल परसों की नहीं आज की बात कहता हूँ,
इश्क का ये फलसफा, ये कहानी पुरानी भी नहीं है/
हम और वो चले थे साथ- साथ, हाथों में हाथ लेकर,
उनके चुंबन के सिवा आज कोई निशानी भी नहीं है/
हम तुम्हें क्या बताएँ, किस मोड़ से तुम मुड़ जाओगे,
अभी तो हो हमकदम, ये किसी की मेहरबानी भी नहीं है/
एक से बढ़ कर फिलास्फर मिले मुझे वफा की राह में,
इश्क समंदर नहीं, इसमें समंदर की मेजबानी भी नहीं है/
गुजर जाती है जिंदगी यूँ ही, रोजमर्रा के खेलों में
उलझ कर,
जो तुम मुझे मिल जाओ, इस खेल में आसानी भी नहीं है/
मेरी गजलों की फेहरिस्त इतनी लंबी, तुम सरापा समा
जाओ,
कल की दुनिया की उसमें कोई बदगुमानी भी नहीं है/
इधर मेरे करीब आ जाओ, ओ कजरारे नयनों वाली,
तेरी नथ झूलती है हवाओं से, किसी की कारस्तानी भी नहीं है/
पहले तुझे सौम्य गुले- गुलाब जानता था अब शोख
चटकीली अदा काबिज है,
किसी की इसमें, किसी तरह की जररानवाजी भी
नहीं है/
इस मौसम में भी जो नहाए नहीं, रगड़ दिए बस गाल,
क्या आज की फुहारे- घटा कुछ खास मस्तानी भी नहीं है/
मुहब्बतों के इस आज के दौर में, तुझसे लिपट रो तो हम लेंगे,
फिर ये न कहना आजकल की मुहब्बत में रुलाई भी
नहीं है/
आवाजें देता रहा हूँ सदा से तुम्हें, तुम्हें कद्र ही कहाँ
करना आया,
लहरों के शोर में कुछ कही- सुनी और कुछ अनसुनी
भी नहीं है/
दिल की कहता हूँ, दिले- आश्नां भी तुम्हीं, आईना भी
तुम्हीं हो,
दिल के नगमों के नगीनों में, वो चमक, वो ताबानी भी
नहीं है/
मशहूर हो तुम जमाने में, मेरी वसीयत की राजकुमारी
तुम्हीं हो,
प्यार के रंगों की बहार हो तुम, कहीं खिली रातरानी
भी नहीं है/
सजदा करता हूँ मस्जिदों में, घंटे-घड़ियाल बजाता
मंदिरों में,
नहीं सुनता कोई खुदा, मुझ पर किसी की मेहरबानी
भी नहीं है/
हम कहते हैं, मुहब्बत की राह इतनी आसां नहीं ऐ
मुसाफिरों!
रात- दो रात रुकने से क्या होता है, इसमें किसी खास
की तीमारदारी भी नहीं है/
हासिल क्या हुआ, उनकी नाजों भरी महफिल में तुम्हें
भी' रतन',
उनकी फसल पे क्या तुम्हारी कोई जमींदारी भी नहीं
है/
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जी चाहता है रोज तुझसे बातें होती रहें
रोज-रोज, तेरी-मेरी मुलाकातें होती रहें
झीना काला दुपट्टा, तेरे बदन पे सजता रहे
गोरी कलाइयों से कंगन की आवाजें आती रहें
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तेरे चेहरे पे मुस्कराहट पाने को दिल तरसता है
तेरी आँखों की बरसती शोखी को दिल तरसता है
पाजेब तेरी छनकती है, हलचल दिल में होती है
तू भी समझ जा, तेरा प्यार पाने को दिल तड़पता है
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नजर झुका के तुम जाने क्यूँ मुझसे बात करती हो
बातों ही बातों में तुम प्यार प्यार का इजहार करती हो
कितनी भोली और मासूम, बड़ी कमसिन हो तुम
सबेरे सूर्यरश्मि तेरे माथे पे छितरा कर तेरा इस्तकबाल
करती है//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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