तब्दील होती है,
समझ न आया,
दिले- हाजिरा को मेरे/
हम उन्हें अपना,
महबूब ही समझते रहे,
वो वार कर गए गले पे,
बकरा समझ के मुझे/
वो तो खैरियत हुई,
बमुश्किल जान बचाई,
वरना उनका घर,
शुमारे- मकतल हो गया होता//
राजीव रत्नेश

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