Thursday, March 19, 2026

मेरे सफर में आके मिल ( कविता)

तेरी रहगुजर से गुजरा हूँ,
मगर तू मिली नहीं/
तेरी याद कुछ यूँ आई,
दिल रहा वश में नहीं/

महफिलों में आया मगर,
तेरी महफिल नहीं/
छलक आए यादों के जाम,
बहा आँख का काजल नहीं/

तेरी महफिल जवान थी,
रौनक बढ़ गई थी/
मगर तू नहीं थी साकिया!
प्यास दिल की बुझी नहीं/

जाम में थे सराबोर सभी,
मैं ही न था बेहोश/
कैसे हो जाता मदहोश,
पिलाने वाली जो तू नहीं/

बरसों की साध थी मेरी,
फिर आऊँगा तेरी महफिल में/
फिर से तेरी मुहब्बत का दीप,
जलाऊँगा अपने दिल में/

फिर तेरी याद में रातें,
मेरी बेकल होंगी/
तेरे इंतजार में फेंकता रहूँगा,
केकरियाँ उसी झील में/

वो मंदिरों के घंटे-घड़ियाल,
दिल को तस्कीन देंगे/
वे बहारें, वे हवाएँ,
सारी अवहेलनाएँ बीन लेंगे/

मैं तेरा दीवाना,
फिजा- फिजा मुस्कराएगी/
ये सारे उपवन प्यार की,
तान में लीन होंगे/

बरसात न होगी पर तेरी,
आँखों की शबनम टपकेगी/
ये रात का आलम,
मेरी राहों में हमसफर होंगे/

तेरे बदन से उठती वो,
संदल की महक/
मेरी साँसों के गिर्द,
लिपटी तेरी मुस्कान होगी/

साकिया! बसन्ती उन्माद से,
बोझल तेरी आँखें/
जगमगाती बस्ती में,
महकेंगी तेरी साँसें/

भावों का समंदर,
हिलोंरे लेगा दिल में/
तू न आएगी तो,
दिल से उठेंगी मेरे आहें/

तुझसे मिलना जो न हुआ,
दिल मेरा पुरनम रहा/
साँस घुटती रही, बिन महका,
आरजू का उपवन रहा/

बुझ गए सारी आशाओं के दीप,
कोई सहारा मिल न सका/
तेरी बेवफाई की तपिश से,
जलता ये तन-बदन रहा/

सजेगी कब महफिल तेरी,
फिर छनकेगी तेरी पायल कब?
चलाएगी दौरे- शराब कब,
आँखों से बहाएगी काजल कब?

तड़प-तड़प आहें भरेगी,
फर्श पर लेटी रहेगी/
मैं न आऊँगा तो आँखों से,
बहाएगी तू सावन कब/

वैसे ही बीतेंगे दिन औ' रात,
मैं यहाँ न रहूंगा/
यही तो वो' होटल' है,
क्या ठीक कल कहाँ रहूँगा/

तुझसे मुलाकात होना,
यूँ आसां नहीं लगता/
जाने कहाँ- कहाँ तुझे,
अब ढूँढता फिरूंगा/

बस जाएगी दुनिया मेरी,
फिर से जो तू आए/
दिल बन जाएगा  बगिया,
जो तू आए/

मैं मन-मंदिर का दीप जलाए,
सूनी डगर पे तेरी राह तकता हूँ/
घंटों बैठा रहता हूँ तेरी चाह में,
रहगुजर पे आँखें जमाए/

शायद तू इधर से आए,
महफिल छोड़ जो चली है/
भयावह राहे हैं, भटक न जाए,
तू अभी नई-नवेली कली है/

जाने किसी बदनीयत से,
दिल ना तू लगा बैठे/
क्योंकि वैसे थोड़ी मासूम,
थोड़ी तू मनचली है/

आए जो भटकती कहीं से,
तेरी बाँह मैं थाम लूँगा/
गुले- आरिज का बोसा,
मैं सरे-आम लूँगा/

नहीं फिकर किसी की,
न खौफ जमाने का/
तू क्या नहीं जानती,
वो जोश दीवाने का/

बात की बात में लगा दूँगा,
आग भरी महफिल में/
अभी बाकी है खूने-जिगर,
वो होश परवाने का/

तूने ही तो देखी थी,
जोशे- दीवानगी मेरी/
वो सरे- महफिल,
जोशे- मर्दानगी मेरी/

तुझे बाँहों से पकड कर,
भर लिया था अपनी बाहों में/
कुछ ऐसी ही थी उस वक्त,
जवानी की उमंग, जवानी तेरी/

मच गया था शोर,
भरी बज्म में था हल्ला/
होश खोके' रतन' ने,
खींचा तेरा पल्ला/

सभी थे हक्का-बक्का,
मुँह पर अंगुली लगाए/
तेरे हर आशिक का,
ले गया था खूने- तमन्ना/

बरसती रही शबनम,
तेरी सखी की आँखों से/
उसकी अदा जाहिर होती थी,
उसकी निःश्वासों से/

उसको तो पूछा नहीं रतन ने,
तुझे ही दिल से चाहा/
रह- रह के देखती थी वो,
मेरी ओर खामोश निगाहों से/

कुछ ऐसी हुई हकीकत,
मैंने छोड़ दी तेरी महफिल/
तेरे बगैर बरसों तड़पता रहा,
ये घायल दिल/

सनम! तेरी भी बदली दुनिया,
मेरी भी बदल गई/
आज मुद्दत बाद तेरी,
महफिल में आया/

अभी तक तो मिली नहीं,
मेरे सफर में आके मिल/
बस......
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    इश्क भी जालिम क्या चीज है/
   मिले बगैर दिल को चैन नहीं//

           राजीव रत्नेश
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