होश में तो रहो ( कविता)
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माना आजकल परेशानी में हो बहुत,
इतनी है गुजारिश मगर होश में तो रहो/
अच्छा नहीं यूँ खुद को भी भुला देना,
गुस्ताखी- ए- गैर के लिए खुद को सजा देना/
जिन्दगी एक जाम भी है, जहर भी है,
क्या है जरूरत जामे- जहर होठों से लगा लेना/
खिजां को मुहलत है थोड़ी देर को ही,
थामने को दामने- बहार जोश में तो रहो/
मस्त नजर अब वो रौनके- रुख क्यों नहीं?
तड़प- ओ- बेहाली का आलम, दिल का सुकूं क्यों नहीं?
अफसुर्दा- अफसुर्दा सी नजर आती हो आजकल,
अब वो अदा- ओ जल्व- ए- सितम का जूनं क्यों नहीं?
इजहारे- दिल की बेपर्दगी के अफसोस में तो रहो,
बहारों में घूमो, नज्जार- ए- शौक में तो रहो/
जिन्दगी नहीं है सिर्फ टुकड़ों में जीना,
नहीं है तसल्ली जामे- गम में खुद को डुबो देना/
तुम्हारे जैसे गमे- मुहब्बत मेरे साथ भी हैं,
नफस रुक रुक कर भले चले, न सदा- ए- कजा देना/
न रहो तन्हां, हमेशा महफिले- शोख में तो रहो,
हँसती रहो सदा, मूड- ए- जोक में तो रहो/
फिर तेरी महफिल में रंगों की छटा छाएगी,
जुल्फ तेरी फहरेगी तो फिर घटा छाएगी/
होठों पे थिरकती है तेरे क्यों सदा- ए- सहरा,
फिर तरन्नुम मचलेंगे, उल्फत की सदा आएगी/
कैसे मिलेंगे हम फिर होली, इस सोच में तो रहो,
बेलने के लिए फिर पापड़, आलमे- मयनोश में तो रहो/
राजीव रत्नेश
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