Monday, March 2, 2026

ये बहार न होती

ये बहार न होती ( कविता)
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मेरी जिन्दगी में ये खुशी ये बहार न होती,
गर कश्ती- ए जिंदगी के लिए याद पतवार न होती/

बिखरते-बिखरते रह गया मेरा चंचल मन,
चूड़ियों की खनखनाहट में उलझ गया ये जीवन/
मस्ती छिटकी, प्यार की हवा अंगनाई- अंगनाई चली,
नेह- नाता तुमसे बन गया प्रीत का अनमोल बंधन/

फिर जिंदगी का रिसता जख्म कैसे भर जाता,
जब मुझे बहलाने को पायल की झंकार न होती/

तुम्हारे होठों की लाली बन गई तकदीर मेरी,
सौगाते- जिंदगी बन गई है, ये तस्वीर तुम्हारी/
सुकून बन के जिंदगी में आई हो, ऐ हमकदम!
मेरे जख्मों को सहलाने की अच्छी है तदबीर तुम्हारी/

शर्मो-हया का आंचल जो लगा लेती रुख से अपने,
तो तुम्हारे आबशारे- जुल्फ की ठंडी फुहार न होती/

तुम्हारे न होने से आज प्यास फिर बढ़ गई है,
एक आग सी दिल में मेरे फिर लग गई है/
जाने क्या सोचकर तुम पैगामे- रुस्वाई भेजती हो,
जबकि संवर के ये दुनिया फिर बदल गई है/

पाकर साथ तुम्हारा, साजे- जिंदगी छेड़ दिया था मैंने,
तुम अदा- ए- जफा छोड़ देती, तो जिंदगी अंगार न होती/

मौसमे- बहार में हर कली महकी- महकी थी,
शाखे- जिंदगी पर हर बुलबुल कुहुकी- कुहुकी थी/
वो झरनों की घाटी में, देवदारों के साये तले,
हर बात तुम्हारी मीठी, हर अदा बहकी-बहकी थी/

अब तो हर तमन्ना पर, पड़ गया है मौत का साया,
तुम जो मिल जाती तो जिंदगी ये सोगवार न होती//

             राजीव रत्नेश
      ट्विन टावर, ग्रेटर नोएडा, यू०पी०/
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